20 बच्चे रोजाना करीब 80 साथियों को पढ़ा रहे, पढ़ाई के साथ सीख रहे नेतृत्व और जिम्मेदारी पारिवारिक सहारे से वंचित बच्चों के बीच बन रहा अपनत्व, सहयोग और आत्मविश्वास का नया माहौल

राजगढ़
किसी कक्षा में शिक्षक के सामने बैठकर पढ़ने वाले बच्चों की कहानी आम है, लेकिन राजगढ़ के नेताजी सुभाष चंद्र बोस बालक आवासीय छात्रावास में पढ़ाई का एक अलग ही दृश्य देखने को मिलता है। यहां कभी खुद किसी कठिन सवाल का जवाब तलाशने वाला बच्चा अब वही सवाल अपने साथी को समझाता है। कोई छोटा बच्चा पढ़ने में अटकता है तो उसका बड़ा साथी उसके पास बैठकर उसे फिर से समझाता है। यहां पढ़ाई केवल किताबों तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चे एक-दूसरे के सीखने का सहारा बन रहे हैं। छात्रावास में शुरू की गई ‘साथियों का साथ’ पहल ने बच्चों में पढ़ाई के प्रति रुचि के साथ सहयोग, आत्मविश्वास और नेतृत्व की भावना को भी मजबूत किया है। पहल के तहत छात्रावास के 20 बच्चों को अपने करीब 80 साथियों की पढ़ाई में सहयोग की जिम्मेदारी दी गई है।
*20 बच्चों ने संभाली 80 साथियों की जिम्मेदारी*
नेताजी सुभाष चंद्र बोस बालक आवासीय छात्रावास में कक्षा 1 से 8वीं तक के करीब 100 बच्चे निवासरत हैं। इनमें 41 अनाथ एवं एकल अनाथ बच्चे हैं, जबकि दो बच्चों के माता-पिता जेल में हैं। पारिवारिक सहारे के अभाव के बीच इन बच्चों के लिए छात्रावास ही पढ़ाई, साथियों और सीखने का प्रमुख वातावरण है। इसी वातावरण को सकारात्मक दिशा देते हुए बच्चों में छिपी प्रतिभा को पहचाना गया। पढ़ाई में रुचि रखने और विषयों को बेहतर ढंग से समझने वाले 20 बच्चों को अपने साथियों की मदद करने के लिए प्रेरित किया गया। अब ये बच्चे प्रतिदिन करीब 80 साथियों के अध्ययन में सहयोग कर रहे हैं। कोई हिंदी पढ़ने में मदद करता है, कोई गणित के सवाल समझाता है तो कोई छोटे बच्चों को विषय समझने में सहयोग देता है। यह जिम्मेदारी केवल दूसरे बच्चों को पढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसके माध्यम से बच्चों को नेतृत्व करना, संवाद करना, जिम्मेदारी लेना और दूसरों की मदद करना भी सिखाया जा रहा है।
*साथियों को पढ़ाते-पढ़ाते खुद भी मजबूत हो रहे बच्चे*
इस पहल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यहां पढ़ाने वाला बच्चा भी लगातार सीख रहा है। जब कोई बच्चा अपने साथी के सामने किसी विषय को समझाता है तो उसे खुद उस विषय को और गहराई से समझना पड़ता है। अपनी बात सरल भाषा में रखने का अभ्यास उसके आत्मविश्वास को बढ़ाता है। सवालों का जवाब देते हुए उसकी संवाद क्षमता विकसित होती है और किसी दूसरे बच्चे की परेशानी समझने से उसमें संवेदनशीलता भी आती है। राज्य शिक्षा केंद्र, भोपाल के संचालक द्वारा इन बच्चों को प्रभावी तरीके से पढ़ाने और विषयों को सरल ढंग से समझाने का प्रशिक्षण भी दिया गया। प्रशिक्षण के बाद बच्चों ने विषयवार अपने साथियों को पढ़ाने की जिम्मेदारी संभाली। इससे छात्रावास में पढ़ाई को लेकर सकारात्मक वातावरण बना है। बड़े बच्चे छोटे बच्चों की मदद कर रहे हैं और बच्चे एक-दूसरे की सफलता को अपनी सफलता की तरह देख रहे हैं।
*जहां परिवार का अभाव था, वहां साथियों का साथ बना सहारा*
इन बच्चों की कहानी सिर्फ पढ़ाई की नहीं है। कई बच्चे ऐसे हैं जिन्होंने कम उम्र में ही पारिवारिक अभाव और कठिन परिस्थितियों का सामना किया है। ऐसे में एक-दूसरे का साथ उनके लिए विशेष महत्व रखता है। ‘साथियों का साथ’ ने इसी भावना को एक सकारात्मक दिशा दी है। यहां बच्चों को यह महसूस हो रहा है कि वे अकेले नहीं हैं। उनके साथ पढ़ने वाला कोई बच्चा उनकी परेशानी समझ सकता है, उसे पढ़ाई में मदद कर सकता है और आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है। एक बच्चे का आत्मविश्वास दूसरे बच्चे की ताकत बन रहा है और एक बच्चे की सीख दूसरे बच्चे के लिए रास्ता खोल रही है।
*करीब 100 साल पुराने परिसर में आकार ले रही नई सोच*
नेताजी सुभाष चंद्र बोस बालक आवासीय छात्रावास का परिसर करीब 100 वर्ष पुराना है। पुराने परिसर को बेहतर सुविधाओं के साथ संवारा गया है। यहां बच्चों की शैक्षणिक जरूरतों के साथ उनके सर्वांगीण विकास पर भी ध्यान दिया जा रहा है। छात्रावास में निवासरत करीब 100 बच्चों में से 23 बच्चे प्राथमिक विद्यालय तथा 77 बच्चे एकीकृत माध्यमिक विद्यालय में अध्ययनरत हैं। हाल ही में राज्य शिक्षा केंद्र, भोपाल के संचालक द्वारा छात्रावास का निरीक्षण भी किया गया। उन्होंने बच्चों और स्टाफ की व्यवस्थाओं की सराहना की तथा बच्चों से संवाद कर उनकी पढ़ाई और भविष्य की तैयारियों की जानकारी ली।
*यहां शिक्षा का अर्थ सिर्फ आगे बढ़ना नहीं, किसी को आगे बढ़ाना भी है*
राजगढ़ के इस छात्रावास में शुरू हुई पहल एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण संदेश देती है—बच्चों को केवल पढ़ने का अवसर ही नहीं, बल्कि किसी और को पढ़ाने का अवसर भी दिया जाए। कठिन परिस्थितियों से गुजर रहे इन बच्चों में प्रतिभा की कमी नहीं है। जरूरत है तो सिर्फ उसे पहचानने, अवसर देने और विश्वास करने की। ‘साथियों का साथ’ इसी विश्वास की कहानी है। जहां कभी बच्चों को सहारे की जरूरत थी, आज वही बच्चे किसी और के सहारे बन रहे हैं। यही इस पहल की सबसे बड़ी सफलता है।




