जूते खराब न हों, इसलिए बुजुर्ग की पीठ पर सवार पटवारी!
सीधी में व्यवस्था का शर्मनाक दृश्य, सरकारी कर्मचारी को नाला पार कराने के लिए बुजुर्ग बना ‘सवारी’

सीधी। मध्य प्रदेश के सीधी जिले से सामने आई एक तस्वीर ने सरकारी व्यवस्था के उन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनमें गांव-गांव तक विकास पहुंचने की बात कही जाती है। तस्वीर में एक बुजुर्ग व्यक्ति एक पटवारी को अपनी पीठ पर बैठाकर नाला पार कराता दिखाई दे रहा है। बताया जा रहा है कि पटवारी के जूते खराब न हो जाएं, इसलिए बुजुर्ग ने खुद पानी और कीचड़ में उतरकर उसे अपनी पीठ पर बैठा लिया।
तस्वीर को देखकर पहला सवाल यही उठता है कि आखिर यह किस तरह का विकास है, जहां एक सरकारी कर्मचारी के जूते बचाने के लिए एक बुजुर्ग को अपनी कमर झुकानी पड़ रही है?
जिस व्यक्ति के कंधों पर ग्रामीणों की जमीन, राजस्व रिकॉर्ड और सरकारी योजनाओं से जुड़े कामों की जिम्मेदारी है, उसे नाला पार कराने के लिए एक बुजुर्ग अपनी पीठ उपलब्ध करा रहा है। यह दृश्य किसी फिल्म का हिस्सा नहीं, बल्कि उस ग्रामीण भारत की तस्वीर है जहां आज भी रास्ते, पुल-पुलिया और मूलभूत सुविधाएं कागजों पर ज्यादा और जमीन पर कम दिखाई देती हैं।
सबसे बड़ा सवाल पटवारी के जूते का नहीं है। सवाल उस बुजुर्ग की मजबूरी का है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसने नागरिक को इतना सहज बना दिया कि वह खुद को कष्ट देकर सरकारी कर्मचारी को सुविधा देने लगे।
क्या उस बुजुर्ग को यह डर था कि यदि पटवारी के जूते खराब हो गए तो उसका काम रुक जाएगा? क्या सरकारी कर्मचारी के प्रति सम्मान इतना बढ़ गया कि बुजुर्ग ने अपनी उम्र और शरीर की परवाह किए बिना उसे अपनी पीठ पर बैठाना उचित समझा? या फिर गांव की व्यवस्था ही ऐसी है कि सरकारी कर्मचारी को खुश रखना आम आदमी की मजबूरी बन चुका है?
यह तस्वीर प्रशासन के लिए आईना है। इसमें सिर्फ एक पटवारी नजर नहीं आ रहा, बल्कि पूरी व्यवस्था नजर आ रही है। एक तरफ सरकारी दफ्तरों में बैठकर गांवों के विकास की योजनाएं बनती हैं और दूसरी तरफ ग्रामीण इलाकों में लोग आज भी बरसात में नाले पार करने को मजबूर हैं।
विडंबना देखिए कि सरकार डिजिटल इंडिया, आधुनिक राजस्व व्यवस्था, ऑनलाइन रिकॉर्ड और तकनीक आधारित प्रशासन की बात करती है, लेकिन जमीन पर हालात ऐसे हैं कि किसी सरकारी कर्मचारी को नाला पार कराने के लिए बुजुर्ग की पीठ का सहारा लेना पड़ रहा है।
पटवारी भी आखिर सरकारी व्यवस्था का ही हिस्सा है। यदि उसे किसी गांव में राजस्व संबंधी काम से जाना पड़ता है और वहां पहुंचने का रास्ता इतना खराब है कि नाला पार करना मुश्किल है, तो सवाल पटवारी से ज्यादा उस प्रशासन से पूछा जाना चाहिए जिसने वहां आने-जाने की व्यवस्था तक सुनिश्चित नहीं की।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। यदि सचमुच पटवारी ने अपने जूते बचाने के लिए बुजुर्ग की पीठ पर बैठकर नाला पार किया है, तो यह सरकारी सेवा की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल है। सरकारी कर्मचारी जनता की सेवा के लिए होता है, जनता सरकारी कर्मचारी की सेवा करने के लिए नहीं।
जिस बुजुर्ग को अपने खेत, परिवार और रोजमर्रा की जिंदगी के लिए संघर्ष करना चाहिए, वह अगर सरकारी कर्मचारी को अपनी पीठ पर ढोता दिखाई दे, तो यह सिर्फ हास्यास्पद दृश्य नहीं है। यह उस मानसिकता का संकेत है जिसमें आम आदमी और सरकारी तंत्र के बीच बराबरी का रिश्ता कमजोर पड़ जाता है।
सरकार को इस तस्वीर को वायरल होने वाली एक और तस्वीर मानकर भूल नहीं जाना चाहिए। इसे एक शिकायत की तरह देखना चाहिए। यह शिकायत उस सड़क की है जो नहीं बनी। यह शिकायत उस पुलिया की है जो नहीं बनी। यह शिकायत उस प्रशासनिक व्यवस्था की है जो गांव तक पहुंच तो गई, लेकिन गांव तक सुविधा नहीं पहुंचा पाई।
सीधी की यह तस्वीर पूछ रही है कि विकास आखिर किसके लिए है? सरकारी फाइलों में बने पुलों के लिए या उन बुजुर्गों के लिए जिन्हें आज भी नाला पार करने के लिए अपनी पीठ मजबूत करनी पड़ती है?
और अगर वाकई पटवारी के जूते खराब होने से बचाने के लिए बुजुर्ग को अपनी पीठ पर बैठाया गया, तो फिर सवाल और भी बड़ा है जिस देश में गरीब अपने जूते तक बचाने के लिए संघर्ष करता है, वहां सरकारी कर्मचारी के जूते बचाने की जिम्मेदारी भी क्या जनता की ही है?
यह तस्वीर मजाक नहीं है। यह व्यवस्था पर एक गंभीर टिप्पणी है। सरकार चाहे तो इसे शर्मनाक दृश्य मानकर नजरअंदाज कर सकती है, लेकिन जनता इसे उस भारत की तस्वीर के रूप में देख रही है जहां विकास की सड़क खत्म होते ही किसी बुजुर्ग की पीठ शुरू हो जाती है।




