राजगढ़ राजा की मन्नत, पुत्र रत्न की खुशी और 150 साल पुरानी विरासत… जन्माष्टमी पर जीवंत हुआ राजगढ़ का ऐतिहासिक कंवरपति
राजमहल मंदिर के पुजारी मनीष शर्मा ने बताया कि यह रियासतकालीन मंदिर करीब 150 वर्ष पुराना है. उनके परिवार की आठवीं-नौवीं पीढ़ी यहां भगवान श्री राधाकृष्ण की पूजा करती आ रही है. मंदिर में भगवान श्री राधाकृष्ण के साथ गजलक्ष्मी की प्रतिमा भी स्थापित है.

राजगढ़ जिला मुख्यालय स्थित ऐतिहासिक कंवरपति राजमहल में जन्माष्टमी को लेकर तैयारियां पूरी हो चुकी हैं. राजमहल परिसर में बने करीब 150 साल पुराने श्री राधाकृष्ण और गजलक्ष्मी मंदिर में शुक्रवार रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा. इस मौके पर मंदिर को फूलों, केले के पत्तों, झालरों, गुब्बारों और रंग-बिरंगी रोशनी से बेहद खूबसूरत तरीके से सजाया गया है.
150 साल पुराने मंदिर में आज भी चल रही पूजा की परंपरा
मंदिर के पुजारी मनीष शर्मा ने बताया कि यह रियासतकालीन मंदिर करीब 150 वर्ष पुराना है. उनके परिवार की आठवीं-नौवीं पीढ़ी यहां भगवान श्री राधाकृष्ण की पूजा करती आ रही है. मंदिर में भगवान श्री राधाकृष्ण के साथ गजलक्ष्मी की प्रतिमा भी स्थापित है. मान्यता है कि गजलक्ष्मी की स्थापना इस उद्देश्य से की गई थी कि राज्य में धन-धान्य और समृद्धि की कभी कमी न रहे. आज भी मंदिर में पूजा-पाठ की पुरानी परंपराएं उसी तरह निभाई जा रही हैं.
राजा ने पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी पूरी होने पर बनवाया राजमहल
मंदिर के इतिहास से जुड़ी एक खास मान्यता भी है. बताया जाता है कि राजगढ़ के राजा विनय सिंह के कोई पुत्र नहीं था. उन्होंने पुत्र प्राप्ति की मन्नत मांगी थी. जब उनकी मनोकामना पूरी हुई और उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, तो खुशी में उन्होंने कंवरपति राजमहल का निर्माण कराया. इसी राजमहल परिसर में सफेद संगमरमर से भगवान श्री राधाकृष्ण और महालक्ष्मी का भव्य मंदिर बनवाया गया. मंदिर को इटालियन शैली में तैयार कराया गया था. राजा खुद भी रोज मंदिर पहुंचकर पूजा करते थे, जबकि राजपुरोहित नियमित रूप से यहां पूजन करते थे.
संगमरमर, विदेशी झूमर और इटालियन शैली आज भी आकर्षण मंदिर की खासियत इसकी बनावट भी है. सफेद संगमरमर, इटालियन शैली की छत, विदेशी झूमर और उस समय इस्तेमाल की गई विदेशी सामग्री मंदिर को अलग पहचान देती है. करीब डेढ़ सौ साल पुराना संगमरमर आज भी अपनी चमक और खूबसूरती बनाए हुए है. जन्माष्टमी के लिए पूरे मंदिर परिसर को रंग-बिरंगी लाइटिंग से सजाया गया है. सजावट के बाद राजमहल का पूरा परिसर रात में और भी आकर्षक नजर आएगा.
जन्माष्टमी के दिन सुबह भगवान श्रीकृष्ण को पालने में विराजमान कर उन्हें झुलाया गया. इसके बाद दिनभर मंदिर में श्रद्धालुओं के आने का सिलसिला जारी रहा. रात 12 बजे विशेष पूजा-अर्चना के साथ भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाएगा. श्रद्धालु सुरेंद्र दुबे और श्याम दुबे ने बताया कि इस मंदिर की राजगढ़ ही नहीं, बल्कि आसपास के क्षेत्रों में भी विशेष मान्यता है. जन्माष्टमी के अवसर पर राजगढ़ जिले के अलावा दूर-दराज से भी श्रद्धालु यहां भगवान श्री राधाकृष्ण के दर्शन करने पहुंचते हैं. श्रद्धालुओं की मान्यता है कि मंदिर में सच्चे मन से प्रार्थना करने पर मनोकामनाएं पूरी होती हैं. यहां खासतौर पर संतान और पुत्र प्राप्ति का आशीर्वाद मिलने की भी मान्यता है.




