695 अरब टन बर्फ… सिर्फ दो साल में अंटार्कटिका में कैसे हुआ इतना बड़ा बदलाव?
हजारों किलोमीटर दूर समुद्र की गर्मी ने बढ़ा दी पूर्वी अंटार्कटिका में बर्फबारी, वैज्ञानिकों ने खोजी हैरान करने वाली कड़ी

अंटार्कटिका। दुनिया का सबसे ठंडा और बर्फ से ढका महाद्वीप लंबे समय से तेजी से बर्फ खोने के कारण वैज्ञानिकों की चिंता का केंद्र रहा है। लेकिन वर्ष 2021 से 2023 के बीच यहां एक ऐसा बदलाव दर्ज किया गया, जिसने वैज्ञानिकों को भी चौंका दिया। इस अवधि में अंटार्कटिका की बर्फ की मात्रा में करीब 695 अरब टन की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
यह बढ़ोतरी इसलिए खास है क्योंकि इससे पहले करीब दो दशकों तक अंटार्कटिका औसतन हर साल लगभग 140.5 अरब टन बर्फ खो रहा था।
वजह अंटार्कटिका से हजारों किलोमीटर दूर
वैज्ञानिकों के अध्ययन के मुताबिक इस असाधारण बदलाव का संबंध अंटार्कटिका से हजारों किलोमीटर दूर पश्चिमी प्रशांत और पूर्वी हिंद महासागर के आसपास के समुद्री क्षेत्र में हुई असामान्य गर्मी से जुड़ा पाया गया।
2021 से 2023 के दौरान इस क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से गर्म रहा। इस गर्मी ने वायुमंडलीय परिसंचरण को प्रभावित किया और एक लंबी वायुमंडलीय लहर पैदा हुई।
समुद्र की गर्मी से अंटार्कटिका में कैसे पहुंची नमी
वायुमंडल में बनी इस लहर ने हजारों किलोमीटर दूर अंटार्कटिका के ऊपर हवा के दबाव और हवाओं के पैटर्न को प्रभावित किया। इसके परिणामस्वरूप समुद्र से नमी लेकर आने वाली हवाएं पूर्वी अंटार्कटिका की ओर पहुंचीं।
वहां पहुंची अतिरिक्त नमी ने भारी बर्फबारी को जन्म दिया।
यानी एक क्षेत्र में समुद्र का गर्म होना सीधे तौर पर दूसरे महाद्वीप में बर्फबारी बढ़ने से जुड़ गया।
क्वीन मैरी लैंड और विल्केस लैंड में सबसे ज्यादा असर
इस बर्फ बढ़ोतरी का सबसे बड़ा हिस्सा पूर्वी अंटार्कटिका के क्वीन मैरी लैंड और विल्केस लैंड क्षेत्रों में दर्ज किया गया।
इन दोनों क्षेत्रों ने कुल बढ़ोतरी का करीब 68 प्रतिशत हिस्सा अपने भीतर समेटा।
पूर्वी अंटार्कटिका में पृथ्वी की विशाल मात्रा में जमी बर्फ मौजूद है। इसलिए वहां बर्फबारी में हुई बड़ी वृद्धि का असर पूरे अंटार्कटिका के कुल बर्फ संतुलन के आंकड़ों पर साफ दिखाई देता है।
पश्चिमी अंटार्कटिका में कहानी बिल्कुल अलग
हालांकि पूरे अंटार्कटिका की तस्वीर को देखकर यह मान लेना गलत होगा कि बर्फ पिघलना रुक गया है।
इसी अवधि में पश्चिमी अंटार्कटिका लगातार बर्फ खोता रहा। वहां अपेक्षाकृत गर्म समुद्री पानी बर्फ की चट्टानों और आइस शेल्फ के निचले हिस्सों को पिघलाने में लगातार भूमिका निभाता रहा।
इसलिए पूर्वी हिस्से में हुई असाधारण बर्फबारी ने कुछ समय के लिए कुल बर्फ संतुलन को बदल दिया, लेकिन पश्चिमी हिस्से में जारी नुकसान खत्म नहीं हुआ।
क्या जलवायु परिवर्तन रुक गया?
बिल्कुल नहीं।
वैज्ञानिकों के अनुसार 2021-23 की यह असाधारण बर्फ बढ़ोतरी एक अस्थायी जलवायु घटना थी। इसे अंटार्कटिका में दीर्घकालिक बर्फ बढ़ने की शुरुआत नहीं माना जा सकता।
लंबी अवधि में अंटार्कटिका का बर्फ संतुलन अभी भी चिंता का विषय बना हुआ है, विशेषकर पश्चिमी अंटार्कटिका में।
एक घटना, जो बताती है धरती का मौसम कितना जुड़ा हुआ है
अंटार्कटिका की यह घटना जलवायु प्रणाली की एक महत्वपूर्ण सच्चाई सामने लाती है—धरती के अलग-अलग हिस्सों का मौसम एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा हुआ है।
भूमध्य रेखा के पास समुद्र के तापमान में बदलाव हजारों किलोमीटर दूर वायुमंडलीय हवाओं को प्रभावित कर सकता है और उसका असर दुनिया के सबसे ठंडे महाद्वीप में होने वाली बर्फबारी तक पहुंच सकता है।
695 अरब टन बर्फ की यह कहानी सिर्फ अंटार्कटिका की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि पृथ्वी की जलवायु प्रणाली कितनी जटिल और आपस में जुड़ी हुई है।
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