जहां कभी था जंगल, आज गूंजती है आस्था — संकल्प से साकार हुआ श्री अंजनीलाल धाम

राजगढ़ कभी घने जंगल, कंटीली झाड़ियों और दुर्गम रास्तों के बीच एक छोटे से चबूतरे पर विराजमान भगवान श्री अंजनीलाल जी का स्थान आज श्रद्धा, सेवा और संकल्प के भव्य केंद्र श्री अंजनीलाल धाम के रूप में पहचान बना चुका है। करीब 52 वर्ष पहले कुछ युवाओं ने जिस निर्जन स्थल पर सेवा का संकल्प लिया था, वह संकल्प आज एक भव्य धार्मिक एवं सामाजिक केंद्र का स्वरूप ले चुका है।
*डेढ़ हजार रुपये के संकल्प से शुरू हुई विकास की ऐसी यात्रा, जो पांच दशक बाद बनी भव्य धाम की पहचान*
वर्ष 1972-73 में कुछ युवाओं ने खुले आसमान के नीचे विराजमान भगवान श्री अंजनीलाल जी की प्रतिमा के लिए छाया की व्यवस्था करने का संकल्प लिया। करीब 1500 रुपये की लागत से प्रस्तावित टीन शेड के लिए युवाओं ने आपसी सहयोग और जनसहयोग से राशि जुटाई। एक छोटे से प्रयास से शुरू हुई यह यात्रा आगे चलकर मंदिर के निरंतर विकास की आधारशिला बनी।वरिष्ठजनों के मार्गदर्शन और श्रद्धालुओं के सहयोग से युवाओं ने मंदिर समिति का गठन किया। समिति के सदस्यों ने स्वयं श्रमदान किया और जनसहयोग से विकास कार्यों को गति दी। दान राशि के पारदर्शी उपयोग और सेवा भावना ने समाज में विश्वास कायम किया और धीरे-धीरे इस स्थान का स्वरूप बदलता चला गया।
*चबूतरे से भव्य मंदिर तक—आस्था ने बदल दी अजनार नदी किनारे की तस्वीर*
आज यहां मकराना मार्बल से निर्मित भव्य श्री अंजनीलाल मंदिर, विशाल शिवालय, दक्षिण भारतीय शैली में निर्मित श्री राम-जानकी मंदिर, विशाल सभा भवन, आरोग्य भवन, यज्ञशाला, सुंदर पार्क, कार्यालय भवन और विशाल मंदिर द्वार श्रद्धालुओं को आकर्षित करते हैं। स्वच्छ एवं सुंदर परिसर और अजनार नदी के तट का प्राकृतिक परिवेश इस धाम की सुंदरता को और बढ़ाता है। धार्मिक आस्था के साथ प्राकृतिक सौंदर्य का संगम श्री अंजनीलाल धाम को क्षेत्र का विशिष्ट आकर्षण बनाता है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति के साथ प्रकृति की सहज सुंदरता का भी अनुभव होता है।
*एक परंपरा, जो बनी आध्यात्मिक पहचान—प्रवचन से महोत्सवों तक निरंतर बढ़ता रहा आस्था का कारवां*
वर्ष 1974 की चैत्र नवरात्रि में मंदिर पर कलशारोहण के साथ प्रवचन परंपरा की शुरुआत हुई। समय के साथ यहां नवरात्रि महोत्सव, हनुमान जयंती, शरद पूर्णिमा सहित विभिन्न धार्मिक आयोजन होने लगे। संत-महात्माओं और विद्वानों के प्रवचनों ने इस धाम की आध्यात्मिक पहचान को और मजबूत किया। श्री अंजनीलाल मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री कैलाश गुप्ता टाटा के अनुसार, मंदिर निर्माण और विकास की लंबी यात्रा के बाद अब ट्रस्ट सामाजिक एवं रचनात्मक कार्यों को विस्तार देने की दिशा में आगे बढ़ने का संकल्प लेकर कार्य कर रहा है।
*युवाओं के संकल्प से बनी सेवा की मिसाल*
पांच दशक से अधिक समय पहले एक छोटे से चबूतरे से सेवा की शुरुआत करने वाले युवाओं का समर्पण आज ब्यावरा के लिए प्रेरणा बन चुका है। तत्कालीन समिति के सदस्यों, वरिष्ठजनों और श्रद्धालुओं के निरंतर सहयोग से यह धाम समय के साथ विकसित होता गया। श्री अंजनीलाल धाम आज केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि श्रद्धा, सेवा, समर्पण और सामाजिक सहभागिता का जीवंत केंद्र है। एक छोटे से चबूतरे से शुरू हुई यह यात्रा बताती है कि जब आस्था के साथ संकल्प, सेवा और जनसहयोग जुड़ते हैं, तो वीरान स्थल भी भव्य आस्था के धाम में बदल सकता है।




