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मोहन यादव का यूथ कॉन्क्लेव और दे धनाधन कुर्सी फेक! युवाओं से संवाद के बाद जुबिन नौटियाल की परफॉर्मेंस में बिगड़ा माहौल, बैरिकेडिंग पर स्टूडेंट्स और पुलिस आमने-सामने, अंकित गर्ग ने संभाली स्थिति

भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव का सीएम यूथ कॉन्क्लेव-2026 मंगलवार को राजधानी के लाल परेड मैदान में युवाओं के संवाद से शुरू हुआ, लेकिन कार्यक्रम के बाद तस्वीर कुछ ऐसी बदली कि युवाओं के सवाल-जवाब से ज्यादा चर्चा बैरिकेडिंग, पुलिस और कुर्सियों की होने लगी। मंच से युवा शक्ति, रोजगार, भविष्य और विकास की बातें चल रही थीं, लेकिन जुबिन नौटियाल की परफॉर्मेंस शुरू होते ही मैदान में कुछ देर के लिए ऐसा माहौल बना कि सवाल-जवाब की जगह धक्का-मुक्की और विवाद दिखाई देने लगा।

 

मुख्यमंत्री ने कार्यक्रम में युवाओं से संवाद किया और उनके सवालों के जवाब दिए। बड़ी संख्या में स्टूडेंट्स इस आयोजन में पहुंचे थे। मुख्यमंत्री का संबोधन खत्म होने के बाद जैसे ही जुबिन नौटियाल की परफॉर्मेंस शुरू हुई, युवाओं का उत्साह कई गुना बढ़ गया। बड़ी संख्या में छात्र मंच के करीब पहुंचना चाहते थे, लेकिन वहां लगी बैरिकेडिंग ने रास्ता रोक रखा था। इसके बाद स्टूडेंट्स और पुलिस के बीच कहासुनी शुरू हो गई।

देखते ही देखते मामला इतना बढ़ा कि कुछ स्टूडेंट्स बैरिकेड्स पर चढ़ गए। पुलिस ने उन्हें रोकने की कोशिश की तो विवाद और तेज हो गया। भीड़ में धक्का-मुक्की की स्थिति बनी और कुछ कुर्सियां भी फेंके जाने की बात सामने आई। यानी जिस मैदान में युवाओं को भविष्य की नई उड़ान के सपने दिखाए जा रहे थे, उसी मैदान में कुछ देर बाद कुर्सियां हवा में उड़ती नजर आईं। सोशल मीडिया की भाषा में कहें तो—मोहन यादव का यूथ कॉन्क्लेव और दे धनाधन कुर्सी फेक!

 

घटना के दौरान भीड़ में एक छात्रा के दब जाने की बात भी सामने आई, जिसने पूरे घटनाक्रम को और गंभीर बना दिया। हजारों युवाओं की मौजूदगी वाले कार्यक्रम में भीड़ का दबाव बढ़ना किसी भी समय खतरे का कारण बन सकता है। ऐसे में सुरक्षा व्यवस्था और भीड़ प्रबंधन को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

 

विवाद के दौरान पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया। इसी बीच कुछ छात्रों को पुलिस द्वारा थप्पड़ मारे जाने की बात भी सामने आई। हालांकि पूरे घटनाक्रम में पुलिस कार्रवाई की परिस्थितियों और उसके कारणों पर आधिकारिक रूप से विस्तृत जानकारी सामने आना बाकी है, लेकिन मौके की तस्वीर ने आयोजन की व्यवस्थाओं पर सवाल जरूर खड़े कर दिए।

 

सबसे दिलचस्प बात यह रही कि जिस कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को संवाद का मंच देना था, उसी कार्यक्रम में युवा और पुलिस आमने-सामने दिखाई दिए। मंच पर मुख्यमंत्री युवाओं से सवाल पूछ रहे थे और युवाओं के सवालों के जवाब दे रहे थे, लेकिन मंच से दूर बैरिकेडिंग के पास हालात कुछ और कहानी कह रहे थे। यहां संवाद की जगह तनाव था और उत्साह के बीच व्यवस्था संभालने की चुनौती।

 

स्थिति जब ज्यादा बिगड़ने की ओर बढ़ रही थी, तब युवा मोर्चा के नेता अंकित गर्ग ने हस्तक्षेप किया। उन्होंने छात्रों और पुलिस के बीच बातचीत का रास्ता बनाने की कोशिश की और युवाओं को शांत रहने के लिए समझाया। बताया जा रहा है कि उन्होंने मामले को टकराव की दिशा में जाने से रोकने और कार्यक्रम को सामान्य तरीके से आगे बढ़ाने में भूमिका निभाई। ऐसे समय में उनका हस्तक्षेप इसलिए महत्वपूर्ण रहा क्योंकि हजारों युवाओं की भीड़ में विवाद बढ़ता तो स्थिति और गंभीर हो सकती थी।

 

दरअसल, लोकप्रिय कलाकार की प्रस्तुति के दौरान युवाओं का उत्साहित होना स्वाभाविक है। जुबिन नौटियाल को देखने और सुनने के लिए छात्र मंच के करीब जाना चाहते थे। लेकिन ऐसे आयोजनों में भीड़ की मनोवृत्ति और उत्साह को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था पहले से मजबूत होना जरूरी है। बैरिकेडिंग की व्यवस्था, आने-जाने के रास्ते और मंच के आसपास भीड़ नियंत्रण की रणनीति में थोड़ी सी चूक भी बड़े विवाद का कारण बन सकती है।

 

यूथ कॉन्क्लेव का संदेश युवाओं को अवसर देने और उनकी ऊर्जा को प्रदेश के विकास से जोड़ने का था। मुख्यमंत्री ने युवाओं के सवालों के जवाब देकर संवाद की तस्वीर पेश की। लेकिन कार्यक्रम के बाद जो दृश्य सामने आए, उन्होंने इस संदेश पर अलग ही सवाल खड़े कर दिए। युवा कार्यक्रम में युवाओं का पुलिस से भिड़ना और कुर्सियों का फेंका जाना आयोजन की व्यवस्थाओं पर बहस के लिए पर्याप्त है।

 

सवाल यह भी है कि यदि आयोजकों को पहले से मालूम था कि लोकप्रिय गायक की प्रस्तुति में हजारों युवा शामिल होंगे, तो भीड़ को नियंत्रित करने की पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं दिखाई दी? क्या बैरिकेडिंग ऐसी थी कि युवाओं का उत्साह टकराव में बदल गया? क्या पुलिस और छात्रों के बीच संवाद की कोई बेहतर व्यवस्था हो सकती थी? और सबसे बड़ा सवाल क्या यूथ कॉन्क्लेव जैसे आयोजन में युवाओं की ऊर्जा को संभालने के लिए सिर्फ सुरक्षा बल पर्याप्त हैं या संवाद की व्यवस्था भी उतनी ही जरूरी है?

 

फिलहाल कार्यक्रम समाप्त हो गया, मुख्यमंत्री का संवाद भी हुआ और सांस्कृतिक कार्यक्रम भी। लेकिन मंगलवार की इस शाम में युवाओं के सवालों से ज्यादा चर्चा उस वक्त की हो रही है जब बैरिकेडिंग के पास छात्र और पुलिस आमने-सामने आए। कुर्सियां फेंकी गईं, एक छात्रा के भीड़ में दबने की बात सामने आई और पुलिस पर छात्रों को थप्पड़ मारने के आरोप लगे।

 

युवा संवाद के मंच से लेकर कुर्सी फेंकने तक की यह तस्वीर निश्चित तौर पर आयोजन की व्यवस्थाओं पर सवाल छोड़ गई है। राहत की बात यही रही कि स्थिति को और बिगड़ने से रोकने के लिए अंकित गर्ग ने हस्तक्षेप किया और मामले को संभालने की कोशिश की। अब देखना यह होगा कि इस घटनाक्रम से आयोजक क्या सबक लेते हैं। क्योंकि युवाओं का कॉन्क्लेव अगर संवाद के बजाय बैरिकेडिंग और कुर्सियों के लिए याद किया जाए, तो अगली बार मंच पर भाषण से पहले व्यवस्था को मजबूत करना शायद ज्यादा जरूरी होगा।

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