श्रम कानूनों के प्रति अनभिज्ञता कर्मचारियों के शोषण का मुख्य कारण: एडवोकेट मयूर मिश्रा
अवैध सेवा समाप्ति और वेतन विवाद में 'श्रम न्यायालय' है अचूक हथियार, जागरूक होना समय की मांग

जबलपुर, मध्य प्रदेश। मोहम्मद असलम बाब वर्तमान कार्य-संस्कृति और औद्योगिक परिवेश में श्रमिकों व कर्मचारियों के अधिकारों की रक्षा हेतु स्थापित ‘श्रम न्यायालयों’ (Labour Courts) की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो गई है। बावजूद इसके, जमीनी स्तर पर आम कर्मचारियों के बीच इन न्यायालयों की कार्यप्रणाली और अपने विधिक अधिकारों को लेकर व्यापक जागरूकता का अभाव बना हुआ है। इसी अज्ञानता का लाभ उठाकर अक्सर निजी और संस्थानिक क्षेत्रों में कर्मचारियों का शोषण होता है।
उच्च न्यायालय जबलपुर के प्रतिष्ठित अधिवक्ता मयूर मिश्रा ने इस गंभीर विषय पर प्रकाश डालते हुए कहा कि श्रम न्यायालय केवल एक कानूनी संस्था नहीं, बल्कि कर्मचारियों के लिए एक ‘सुरक्षा कवच’ है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि जानकारी के अभाव में कई कर्मचारी अन्याय सहते रहते हैं और समय सीमा (Limitation) निकल जाने के कारण बाद में चाहकर भी कानूनी राहत नहीं पा पाते।
किन स्थितियों में मिल सकता है न्याय?
अधिवक्ता मयूर मिश्रा ने विस्तार से जानकारी देते हुए बताया कि यदि किसी कर्मचारी को बिना उचित कानूनी प्रक्रिया अपनाए नौकरी से निकाल दिया गया हो (Illegal Retrenchment), वेतन में कटौती की गई हो, बोनस या भत्तों का भुगतान न किया गया हो, या सेवा शर्तों का उल्लंघन किया जा रहा हो, तो श्रम न्यायालय एक सशक्त मंच है। उन्होंने कहा, “श्रम न्यायालय की न्यायिक प्रक्रिया को जानबूझकर सरल और कम खर्चीला रखा गया है ताकि समाज का अंतिम व्यक्ति भी बड़े संस्थानों के विरुद्ध अपनी आवाज बुलंद कर सके और न्याय पा सके।”
प्रभावी कदम: पहले श्रम विभाग, फिर न्यायालय
कानूनी बारीकियों को समझाते हुए श्री मिश्रा ने कर्मचारियों को महत्वपूर्ण सलाह दी। उन्होंने कहा कि विवाद की स्थिति उत्पन्न होते ही कर्मचारी को सबसे पहले श्रम विभाग (Labour Department) में लिखित शिकायत दर्ज करानी चाहिए। यहाँ सुलह (Conciliation) की कोशिश की जाती है, और यदि मामला वहां नहीं सुलझता, तो उसे विधिवत रूप से श्रम न्यायालय के सुपुर्द (Refer) कर दिया जाता है। यह प्रक्रिया मामले को कानूनी रूप से अधिक मजबूत बनाती है।
सामूहिक प्रयास और विधिक साक्षरता की अपील
अधिवक्ता मयूर मिश्रा ने शासन-प्रशासन और राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (State Legal Services Authority) से भी अपील की है कि वे औद्योगिक क्षेत्रों और व्यापारिक केंद्रों पर ‘विधिक साक्षरता शिविरों’ का आयोजन करें। उन्होंने कहा कि जब तक श्रमिक अपने अधिकारों और श्रम कानूनों की धाराओं के प्रति सजग नहीं होगा, तब तक न्याय की संकल्पना अधूरी है। समाज के प्रबुद्ध वर्ग और श्रमिक संगठनों को भी इस दिशा में आगे आकर कर्मचारियों का मार्गदर्शन करना चाहिए।



