21 साल बाद फिर दौड़ी सरकारी बसें, 2005 में बंद करने का फैसला अब 2026 में ‘सुगम परिवहन’ बनकर लौटा
बाबूलाल गौर के दौर में खत्म हुआ परिवहन निगम, 2024 में हाईकोर्ट पहुंचा सार्वजनिक परिवहन का सवाल, अब 351 बसों से नई शुरुआत; सरकार का 2031 तक 15 हजार बसों का लक्ष्य

भोपाल। मध्यप्रदेश की सड़कों पर आखिरकार 21 साल बाद सार्वजनिक परिवहन की नई तस्वीर दिखाई देने लगी है। जिस राज्य में कभी सरकारी बसें गांव से शहर और शहर से दूसरे शहर तक आम आदमी की सबसे बड़ी सवारी हुआ करती थीं, उसी मध्यप्रदेश में वर्ष 2005 में राज्य सड़क परिवहन निगम के परिसमापन का सैद्धांतिक फैसला लिया गया था। इसके बाद सरकारी बसों का संचालन धीरे-धीरे बंद हुआ और वर्षों तक प्रदेश की जनता निजी बस ऑपरेटरों के भरोसे रही। अब 2026 में मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा के नाम से सरकार ने एक बार फिर सार्वजनिक बस सेवा शुरू की है। शुक्रवार को भोपाल के भेल दशहरा मैदान से केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी और मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने 351 बसों को हरी झंडी दिखाकर इस नई व्यवस्था की शुरुआत की। सरकार इसे मध्यप्रदेश में आधुनिक, सुरक्षित और सुगम सार्वजनिक परिवहन की नई शुरुआत बता रही है।
लेकिन इन बसों की वापसी सिर्फ एक सरकारी योजना का शुभारंभ नहीं है, बल्कि इसके पीछे दो दशक से ज्यादा लंबी एक ऐसी कहानी है जिसमें सरकारी परिवहन व्यवस्था बंद हुई, निजी बसों को विकल्प बनाया गया, सार्वजनिक परिवहन की कमी को लेकर लगातार सवाल उठते रहे, विधानसभा में मुद्दा पहुंचा और आखिरकार 2024 में राज्य परिवहन निगम को फिर शुरू करने की मांग को लेकर जनहित याचिका हाईकोर्ट तक पहुंच गई।
मध्यप्रदेश विधानसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड के मुताबिक 28 फरवरी 2005 को मध्यप्रदेश राज्य सड़क परिवहन निगम के परिसमापन का सैद्धांतिक निर्णय लिया गया था। इसके बाद निगम की स्वामित्व वाली बसों का संचालन जून 2008 से और अनुबंधित वाहनों का संचालन 30 सितंबर 2010 के बाद पूरी तरह बंद हो गया। यानी 2005 में निगम को खत्म करने का निर्णय हुआ, लेकिन बसों का वास्तविक संचालन उसके बाद कई वर्षों तक अलग-अलग स्वरूप में चलता रहा। यही कारण है कि आज 21 साल बाद बस सेवा की वापसी की चर्चा करते समय 2005 के फैसले और 2008-10 में हुए वास्तविक बंद होने के बीच का अंतर समझना जरूरी है।
सरकार ने बाद के वर्षों में सार्वजनिक परिवहन की जरूरत पूरी करने के लिए निजी बस संचालकों को परमिट देकर यात्री परिवहन जारी रखा। विधानसभा में सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि निजी बस संचालकों के माध्यम से राज्य और अंतरराज्यीय परिवहन की सुविधा उपलब्ध कराई जा रही है। लेकिन कागज पर उपलब्ध परिवहन और जमीन पर आम आदमी को मिलने वाली सुविधा के बीच का अंतर लगातार सवाल खड़े करता रहा। खासकर ग्रामीण क्षेत्रों में बसों की उपलब्धता, समय पर परिवहन, किराए और छोटे कस्बों को बड़े शहरों से जोड़ने की समस्या लंबे समय से बनी रही।
साल 2023 में विधानसभा में राज्य परिवहन निगम को दोबारा शुरू करने का सवाल उठाया गया। उस समय सरकार की ओर से दिए गए जवाब में कहा गया कि निगम का परिसमापन किया जा चुका है और निजी बस संचालकों को परमिट देकर यात्रियों के परिवहन की व्यवस्था की जा रही है। यानी उस समय सरकारी स्तर पर पुराने राज्य परिवहन निगम को उसी स्वरूप में पुनर्जीवित करने की कोई तत्काल योजना सामने नहीं थी।
इसके ठीक बाद सार्वजनिक परिवहन का यह सवाल अदालत तक पहुंचा। सितंबर 2024 में सेंधवा निवासी बीएल जैन ने मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर खंडपीठ में जनहित याचिका दायर कर राज्य परिवहन निगम को पुनः शुरू करने की मांग की। याचिका में सार्वजनिक परिवहन की कमी और आम यात्रियों, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों की परेशानियों का मुद्दा उठाया गया। हाईकोर्ट ने राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा। बाद में इस मामले में सरकार से जवाब को लेकर भी न्यायालय की प्रक्रिया आगे बढ़ी।
यहीं से सरकारी बसों की वापसी की कहानी में अदालत का अध्याय जुड़ता है। हालांकि यह कहना कि हाईकोर्ट के आदेश या दबाव के कारण ही मुख्यमंत्री सुगम परिवहन सेवा शुरू हुई, सरकारी तौर पर प्रमाणित तथ्य नहीं है। सरकार ने इस नई बस सेवा को अपनी नई परिवहन नीति और सार्वजनिक परिवहन के नए मॉडल के रूप में प्रस्तुत किया है। लेकिन यह तथ्य जरूर दर्ज है कि जब राज्य में सार्वजनिक परिवहन की वापसी की मांग को लेकर जनहित याचिका अदालत में पहुंच चुकी थी, उसी व्यापक दौर में सरकार ने सार्वजनिक परिवहन को नए स्वरूप में फिर से शुरू करने की दिशा में कदम बढ़ाया।
अब पुराना राज्य परिवहन निगम अपने पुराने स्वरूप में वापस नहीं आया है। सरकार ने नई व्यवस्था के लिए पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल अपनाया है। इसका मतलब यह है कि सरकार सार्वजनिक परिवहन के लिए नीति, व्यवस्था और निगरानी की भूमिका निभाएगी, जबकि बस संचालन में निजी भागीदारी भी रहेगी। सरकार का दावा है कि इससे लंबे समय तक बस सेवा को टिकाऊ तरीके से चलाने में मदद मिलेगी और यात्रियों को आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकेंगी।
पहले चरण में 351 बसों को सात शहरों में उतारा गया है। इनमें भोपाल, इंदौर, जबलपुर, रीवा, देवास, कटनी और भिंड शामिल हैं। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक 120 बसें इंटरसिटी और 231 बसें इंट्रासिटी सेवा के लिए रखी गई हैं। इंदौर को 145, भोपाल को 106, जबलपुर को 67, रीवा को 18, देवास को 10, कटनी को 3 और भिंड को 2 बसें मिली हैं। सरकार का लक्ष्य पहले वर्ष में करीब 1500 बसें चलाने का है। इसके बाद योजना को विस्तार देते हुए 2031 तक प्रदेश में 15 हजार सार्वजनिक बसें संचालित करने का लक्ष्य रखा गया है।
सरकार की योजना सिर्फ शहरों तक बसें चलाने की नहीं है। 2031 तक प्रदेश की करीब 75 प्रतिशत ग्राम पंचायतों को सार्वजनिक परिवहन से जोड़ने का लक्ष्य भी सामने रखा गया है। इसके अलावा बस स्टैंड, टर्मिनल और डिपो के विकास तथा यात्रियों की सुविधा बढ़ाने की योजना बनाई गई है। सरकार का दावा है कि नई व्यवस्था से रोजाना लाखों यात्रियों को परिवहन सुविधा मिल सकेगी।
नई बस सेवा में तकनीक को भी महत्वपूर्ण हिस्सा बनाया गया है। बसों की निगरानी इंटेलिजेंट ट्रांसपोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम यानी आईटीएमएस से करने की बात कही गई है। बसों में सीसीटीवी कैमरे, पैनिक बटन और रियल टाइम लोकेशन ट्रैकिंग जैसी सुविधाएं शामिल की जा रही हैं। महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा को लेकर भी तकनीकी निगरानी की व्यवस्था का दावा किया गया है। इलेक्ट्रिक और स्वच्छ ईंधन वाली बसों को बढ़ावा देने की बात भी सरकार की योजना में शामिल है।
लेकिन सरकारी बसों की वापसी का असली मूल्यांकन उद्घाटन के मंच से नहीं होगा। इसका मूल्यांकन तब होगा जब कोई गांव का विद्यार्थी सुबह समय पर बस पकड़कर स्कूल पहुंच सकेगा, कोई मजदूर रोज अपने काम पर जा सकेगा, कोई मरीज निजी वाहन या महंगी टैक्सी के भरोसे नहीं रहेगा और किसी छोटे कस्बे का परिवार सुरक्षित और निर्धारित किराए में जिला मुख्यालय तक पहुंच सकेगा। सार्वजनिक परिवहन की असली सफलता बसों की संख्या से नहीं, उनकी नियमितता और पहुंच से तय होगी।
मध्यप्रदेश की जनता के सामने अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार सरकारी परिवहन व्यवस्था लंबे समय तक टिकेगी। क्योंकि प्रदेश पहले भी सरकारी बसों का दौर देख चुका है और सरकारी बसों के गायब होने का दौर भी। 2005 में परिसमापन का निर्णय हुआ। 2008 से निगम की अपनी बसों का संचालन बंद हुआ और 2010 के बाद अनुबंधित बसों का संचालन भी समाप्त हो गया। उसके बाद निजी बसों ने परिवहन की जिम्मेदारी संभाली। अब 2026 में फिर सार्वजनिक परिवहन की जरूरत महसूस हुई है।
यही इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा व्यंग्य भी है। जिस व्यवस्था को कभी खत्म करने का फैसला लिया गया था, आज उसी सार्वजनिक परिवहन की वापसी को विकास और सुविधा की नई शुरुआत के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। नाम बदल गया है, मॉडल बदल गया है, तकनीक बदल गई है, लेकिन जनता की जरूरत नहीं बदली। उसे आज भी ऐसी बस चाहिए जो समय पर मिले, सुरक्षित हो, उचित किराए में चले और उसके गांव तथा शहर के बीच नियमित संपर्क बनाए रखे।
सरकार ने 2031 तक 15 हजार बसों का लक्ष्य रखा है। अब आने वाले पांच वर्षों में यही लक्ष्य सबसे बड़ी परीक्षा होगा। 351 बसों से शुरू हुई यह यात्रा 1500 तक कितनी तेजी से पहुंचती है और फिर 15 हजार तक कितनी वास्तविकता बनती है, यह देखना होगा। उससे भी महत्वपूर्ण यह होगा कि कागज पर दर्ज बसों और सड़क पर दौड़ती बसों के आंकड़ों में कितना अंतर रहता है।
21 साल बाद बस वापस आई है। यह सिर्फ परिवहन विभाग की खबर नहीं, बल्कि उन लाखों यात्रियों की खबर है जो वर्षों से सार्वजनिक परिवहन की कमी झेलते रहे हैं। यह उस नीति पर भी सवाल है जिसने कभी सरकारी परिवहन को खत्म किया और आज उसी सार्वजनिक परिवहन को फिर आवश्यक माना।
कभी सवाल था कि सरकार बस क्यों चलाए। आज सवाल है कि सरकार ने बस चलाने में इतना लंबा इंतजार क्यों किया।
*अब जनता को जवाब भाषण में नहीं चाहिए।*
*जवाब सड़क पर चाहिए।*
351 बसों के रूप में चाहिए, 1500 बसों के विस्तार में चाहिए और 2031 के 15 हजार बसों के लक्ष्य की हकीकत में चाहिए। क्योंकि 21 साल बाद सरकारी बसें फिर सड़क पर आ गई हैं।
अब मध्यप्रदेश की जनता सिर्फ यही चाहती है कि ये बसें फिर 21 साल के लिए गायब न हों।



