न्याय के सिंहासन से निकलकर जब बच्चों के बीच ‘अभिभावक’ बने जिला जज
बेटमा गुरुद्वारे में गंगा-जमुनी तहजीब की मिसाल: जज हिदायत उल्ला खान ने बच्चों को दी ईद की मिठाई, लंगर में चखा प्रेम का स्वाद
बेटमा (इंदौर)(असलम बाबा)अदालती कक्ष की औपचारिकताएं और कानून की मोटी फाइलों के बीच अक्सर न्याय का मानवीय चेहरा ओझल हो जाता है, लेकिन रविवार को बेटमा के ऐतिहासिक गुरुद्वारा साहिब में कुछ अलग ही मंजर था। अवसर था तहसील विधिक सेवा समिति देपालपुर के अध्यक्ष एवं जिला न्यायाधीश श्री हिदायत उल्ला खान के प्रवास का, जो न्याय, संवेदना और सांप्रदायिक सौहार्द की एक बेमिसाल इबारत लिख गया।
परंपरागत स्वागत और लंगर में सादगी
गुरुद्वारा साहिब पहुँचते ही प्रबंधक करनेल सिंह, गुरभेज सिंह और ज्ञानी जी ने न्यायाधीश महोदय का आत्मीय स्वागत किया। श्री खान ने न केवल गुरुग्रंथ साहिब के समक्ष शीश नवाया, बल्कि पंगत में बैठकर लंगर प्रसाद भी ग्रहण किया। उन्होंने सिख पंथ के ‘सेवा और समानता’ के सिद्धांतों को नमन करते हुए सामाजिक समरसता का संदेश दिया।
जब ‘न्याय’ ने थाम लिया ‘इंसानियत’ का हाथ
प्रवास के दौरान एक भावुक मोड़ तब आया जब इंदौर निवासी रविंद्र सिंह अपने दो नन्हे बच्चों के साथ वहां पहुंचे। अदालती आदेशानुसार रविंद्र हर महीने के पहले रविवार को अपने बच्चों से मिलने बेटमा आते हैं। जैसे ही उनकी नजर जिला न्यायाधीश पर पड़ी, वे बच्चों सहित उनके पास पहुंच गए।
इस मौके पर श्री खान का एक अलग ही रूप दिखा। एक न्यायाधीश की गंभीरता छोड़कर वे एक स्नेहमयी अभिभावक बन गए। उन्होंने बच्चों को दुलारते हुए अपने पास बुलाया, उन्हें ईद की मिठाइयां भेंट कीं और गले लगाकर मुबारकबाद दी। कानून की चौखट पर न्याय पाने वाले बच्चों के लिए यह पल किसी उत्सव से कम नहीं था।
“सच्चा न्याय केवल विधिक प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वह मानवीय संवेदनाओं और मूल्यों का संवाहक भी है।”
— प्रवास के दौरान उभरा एक मौन संदेश

इस हृदयस्पर्शी मिलन के साक्षी बने श्रद्धालु और प्रशासनिक अधिकारी भाव-विभोर हो उठे। कार्यक्रम में रीडर शैलेंद्र शर्मा, बेटमा थाने के प्रधान आरक्षक जितेंद्र राठौर, विकास सिंह गौतम और उमेश परमार भी उपस्थित रहे।
निष्कर्ष: यह प्रवास केवल एक आधिकारिक दौरा नहीं, बल्कि इस बात का प्रमाण था कि न्यायपालिका के केंद्र में भी करुणा और जनसेवा की भावना उतनी ही प्रबल है जितनी कि संविधान की धाराएं। गुरुद्वारे की पवित्रता और ईद की मिठास ने मिलकर इंदौर की गंगा-जमुनी तहजीब को एक नया आयाम दे दिया।
