युवा अधिवक्ताओं के लिए ‘पुस्तक सहायता योजना’ की मांग: मयूर मिश्रा ने उठाई आर्थिक संबल की आवाज

जबलपुर/भोपाल: मध्य प्रदेश के न्यायिक हलकों में युवा अधिवक्ताओं के भविष्य को लेकर एक महत्वपूर्ण मांग जोर पकड़ रही है। उच्च न्यायालय के अधिवक्ता मयूर मिश्रा ने प्रदेश सरकार और विधि विभाग से युवा वकीलों के लिए ‘पुस्तक सहायता योजना’ लागू करने का पुरजोर आग्रह किया है। उनका तर्क है कि वकालत के शुरुआती संघर्षपूर्ण वर्षों में यदि नवागत वकीलों को विधिक साहित्य के लिए आर्थिक सहयोग मिलता है, तो इससे न केवल उनका पेशेवर विकास होगा, बल्कि न्याय प्रणाली की गुणवत्ता में भी व्यापक सुधार आएगा।
शुरुआती संघर्ष और संसाधनों का अभाव: एक बड़ी चुनौती
अधिवक्ता मयूर मिश्रा ने रेखांकित किया कि कानूनी पेशा अपने शुरुआती दौर में अत्यधिक धैर्य और संसाधनों की मांग करता है। एक नए अधिवक्ता के लिए उच्च न्यायालय या जिला न्यायालयों में अपनी पहचान बनाना चुनौतीपूर्ण होता है, क्योंकि उनके पास आय के सीमित स्रोत होते हैं। ऐसे में, विधि क्षेत्र की महंगी पुस्तकें, नवीनतम कानून जर्नल, और डिजिटल लीगल डेटाबेस (ऑनलाइन संसाधन) की सदस्यता लेना उनके लिए वित्तीय रूप से लगभग असंभव हो जाता है।
मिश्रा ने कहा, “ज्ञान ही एक अधिवक्ता का सबसे बड़ा हथियार है। यदि संसाधनों के अभाव में युवा वकील अपडेटेड कानून और नज़ीरों (Precedents) से वंचित रह जाते हैं, तो यह उनके करियर के साथ-साथ उनके मुवक्किलों के न्याय के अधिकार के लिए भी नुकसानदेह है।” उन्होंने अन्य राज्यों के उदाहरण देते हुए बताया कि कई प्रदेशों में न्यायालयों और राज्य सरकारों ने युवा वकीलों को विधिक सामग्री खरीदने के लिए एकमुश्त सहायता राशि देने की पहल की है, जो अत्यंत सराहनीय और अनुकरणीय है।
पारदर्शिता और क्रियान्वयन के लिए ठोस सुझाव
योजना को धरातल पर उतारने के लिए मयूर मिश्रा ने एक व्यवस्थित खाका भी प्रस्तुत किया है। उन्होंने सुझाव दिया कि इस योजना का लाभ केवल वास्तविक और जरूरतमंद युवा अधिवक्ताओं तक पहुँचाने के लिए प्रदेश के जिला बार संघों (District Bar Associations) को सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
प्रस्तावित योजना के मुख्य बिंदु:
पात्रता का निर्धारण: जिला बार संघों के माध्यम से उन युवा अधिवक्ताओं की सूची तैयार की जाए जो वास्तव में अभ्यास (Practice) कर रहे हैं।
पारदर्शी वितरण: सहायता राशि का वितरण सीधे अधिवक्ताओं के खातों में या कूपन के माध्यम से किया जाए, जिससे वे विधिक पुस्तकें खरीद सकें।
डिजिटल एक्सेस: वित्तीय सहायता के साथ-साथ, सरकारी स्तर पर ‘सेंट्रल लीगल लाइब्रेरी’ या ऑनलाइन पोर्टल्स का एक्सेस भी रियायती दरों पर उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
मिश्रा ने अंत में राज्य सरकार, विधि विभाग और मध्य प्रदेश राज्य अधिवक्ता परिषद (State Bar Council) से इस संवेदनशील विषय पर विचार करने और जल्द से जल्द एक नीतिगत निर्णय लेने की अपील की है। उनका मानना है कि यह निवेश प्रदेश की न्याय व्यवस्था के भविष्य को सशक्त बनाने की दिशा में एक क्रांतिकारी कदम साबित होगा।



