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संत हर समय जगत के कल्याण की ही भावना के पक्षधर – राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा.

इंदौर मोह के कारण हमारे ज्ञान का पर्दा ढंका रहता है और जीव अज्ञानी ही बना रहता है। अज्ञानी व्यक्ति ज्ञान का अनुभव तो कर सकता है लेकिन ज्ञानी अपने ज्ञान को भूलने के लिए तैयार नहीं होता। द्रव्य तो दूध में भी है और दही में भी है लेकिन दोनों के स्वभाव और प्रकृति अलग-अलग है। संत हर समय जगत के कल्याण की ही भावना के पक्षधर होते हैं। वे चाहते हैं कि संसार में सब सुखी रहे और कोई भी जीव दुखों से घबराए नहीं। विद्वानों ने तो गुरु को भगवान से भी बड़ा कहा है – गुरु गोविन्द दोनों खड़े कांके लागू पांय…..। भगवान सबसे बड़ी शक्ति है फिर भी यदि हमने भगवान के स्थान पर गुरु का चयन कर लिया है तो गुरु हमारे दोषों को निकालकर गुणों की स्थापना कर देंगे।

ये दिव्य विचार हैं संत शिरोमणि प.पू. विद्यासागर म.सा. के परम प्रभावक शिष्य और राष्ट्रसंत मुनि पुंगव प.पू. श्री सुधासागर महाराज के, जो उन्होंने सकल दिगम्बर जैन धर्म प्रभावना समिति के तत्वावधान में छत्रपति नगर स्थित, दलाल बाग परिसर में निर्मित विद्या-सुधा मंडप में चल रहे चातुर्मास महोत्सव में आयोजित समयसार शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर में सांगानेर (जयपुर) से आए युवा विद्वानों एवं विदुषियों को संबोधित करते हुए व्यक्त किए। शिविर में इन विद्वानों के लिए प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया जा रहा है। बुधवार सुबह राष्ट्रसंत प.पू. सुधासागर म.सा. के सानिध्य में जगत कल्याण की कामना से महाशांति धारा का आयोजन कर आचार्यश्री विद्यासागर म.सा. के चित्र का अनावरण संगोष्ठी के पुण्यार्जक गिरीश जैन गिन्नी परिवार, अशोक डोसी, स्वागताध्यक्ष संजय सामरिया आदि ने किया। दीप प्रज्वलन संगोष्ठी संयोजक आनंद गोधा, अक्षय कासलीवाल, भूपेंद्र जैन एवं विजय धुर्रा ने किया। शाम को जिज्ञासा समाधान कार्यक्रम भी हुआ जिसमें राष्ट्रसंत ने आग्रह किया कि कोई भी काम स्पर्धा की भावना से नहीं करना चाहिए।

शिविर में परम्परागत परिधान और वेशभूषा में आए विद्वान और विदुषी आकर्षण का केंद्र बने रहे। इस अवसर पर प.पू. राष्ट्रसंत सुधासागर म.सा. ने कहा कि मोह के साथ योग नहीं हो सकता। मोहरहित अवस्था में ही योग हो सकता है। एक सरल रेखा खींचना बहुत कठिन काम होगा, जब तक कि उसे खींचने के लिए कागज, पेन, ड्राइंग बोर्ड, स्केल, पट्टी आदि की व्यवस्था नहीं होगी। थोडा सा भी हाथ या टेबल हिल जाए तो रेखा टेढ़ी हो जाएगी। इसी तरह हमारी आत्मा में भगवान बनने की ताकत तो है और सबकुछ सरल रेखा बनाने की तरह सरल लगता है लेकिन आत्मा को पाना बहुत कठिन काम है। इसके लिए कठोर पुरुषार्थ की जरूरत है।

मप्र महासभा के संयोजक विजय धुर्रा ने बताया कि प.पू. सुधासागर म.सा के सानिध्य में चल रहे श्रीसमयसार शिक्षण-प्रशिक्षण शिविर में समयसार की गाथाएँ सुनाई जा रही हैं। सांगानेर से आए विद्वान और विदुषी जब समवेत स्वर में इन गाथाओं को सुनाते हैं तो लगता है कि श्रमण संस्कृति को यही पीढ़ी आए बढ़ाएगी जो गुरुदेव के सानिध्य में तैयार हो रही है।

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