रोटी बनाम सिस्टम : अमलाई खदान की आग में जलते मजदूरों के सपने
जब मशीनें रुकती हैं तो सिर्फ उत्पादन नहीं, हजारों घरों के चूल्हे बुझ जाते हैं
अमलाई/सोहागपुर। कोयले की काली परतों के नीचे सिर्फ खनिज नहीं, हजारों मजदूर परिवारों की उम्मीदें दबी होती हैं। लेकिन इन दिनों साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड की अमलाई ओपन कास्ट खदान में चल रहे विवादों ने मजदूरों की जिंदगी को ऐसे मोड़ पर ला खड़ा किया है, जहां उनके सामने सबसे बड़ा सवाल है — रोटी बचाएं या सिस्टम से लड़ें?
खदान में बार-बार काम रुकने और हड़ताल जैसी स्थिति बनने से मजदूर परिवारों की रोजमर्रा की जिंदगी बुरी तरह प्रभावित हो रही है। मजदूर बताते हैं कि खदान का हर विवाद सबसे पहले उनकी मजदूरी पर हमला करता है और मजदूरी रुकते ही पूरे परिवार की जिंदगी संकट में फंस जाती है।
“काम रुका मतलब घर का चूल्हा बुझा”
अमलाई क्षेत्र में रहने वाले एक ठेका मजदूर ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि खदान बंद होने का मतलब उनके बच्चों की भूख से सीधा रिश्ता है। मजदूर की पत्नी ने आंखों में आंसू भरकर कहा,
“साहब लोग ऊपर लड़ते हैं, लेकिन असर हमारे घर पर पड़ता है। जब मजदूरी नहीं मिलती तो बच्चों को समझाना पड़ता है कि आज खर्च मत मांगो।”
मजदूरों का कहना है कि वे रोज अपनी जान जोखिम में डालकर खदान में उतरते हैं। लेकिन जब प्रशासनिक विवाद बढ़ते हैं तो उनकी मेहनत का कोई मूल्य नहीं बचता।
दुर्घटनाओं की छाया में जीते परिवार
स्थानीय मजदूरों के अनुसार खदान क्षेत्र पहले ही जोखिम भरा काम माना जाता है। पूर्व में हुई एक दुर्घटना में एक युवक की मौत के बाद कई परिवारों में डर और असुरक्षा का माहौल और गहरा गया। मजदूरों का आरोप है कि ऐसे मामलों में सच्चाई सामने आने के बजाय विवादों को दबाने की कोशिश की जाती है।
हालांकि इस घटना को लेकर आधिकारिक पुष्टि सामने नहीं आई है, लेकिन मजदूर परिवारों में आज भी भय का वातावरण बना हुआ है।
दबाव और डर के बीच काम करने को मजबूर मजदूर
खदान में कार्यरत ठेका मजदूरों का आरोप है कि प्रशासनिक दबाव के कारण कार्यस्थल का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। मजदूरों का कहना है कि उन्हें बार-बार नौकरी जाने का डर दिखाया जाता है।
एक मजदूर ने बताया,
“हम गरीब लोग हैं। नौकरी ही हमारी जिंदगी है। जब बार-बार डराया जाता है तो हम आवाज भी नहीं उठा पाते।”
मजदूरों का आरोप है कि ठेका कंपनी RKTC Infratech Limited में काम करने वाले श्रमिक भी दबाव के बीच काम करने को मजबूर हैं। हालांकि इस पूरे मामले पर कंपनी या प्रबंधन की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
स्थानीय युवाओं के टूटते सपने
खनन क्षेत्रों में स्थानीय युवाओं को रोजगार देने की व्यवस्था बनाई गई थी, लेकिन अमलाई क्षेत्र में युवाओं के रोजगार को लेकर असंतोष बढ़ रहा है। कई युवाओं का कहना है कि रोजगार की उम्मीद लेकर खदान से जुड़े, लेकिन अब नौकरी जाने का डर उनके भविष्य पर भारी पड़ रहा है।
एक बेरोजगार युवक ने कहा,
“हमारे गांव के लोग खदान से ही जुड़े हैं। अगर यहां रोजगार खत्म हो गया तो हमारे पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचेगा।”
मजदूर परिवारों की अनकही त्रासदी
खदान विवाद का असर सिर्फ मजदूरों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उनके पूरे परिवार को झेलना पड़ता है। मजदूरों की पत्नियां बताती हैं कि मजदूरी रुकने का मतलब बच्चों की फीस न भर पाना, दवाइयों का खर्च रोक देना और घर चलाने के लिए कर्ज लेना होता है।
एक महिला ने कहा,
“हमारे पति खदान में जाते हैं तो डर लगता है कि सुरक्षित लौटेंगे या नहीं। और जब काम रुकता है तो घर कैसे चलेगा यह चिंता अलग होती है।”
सिस्टम बनाम जिंदगी की जंग
विशेषज्ञों का मानना है कि खदान संचालन केवल उत्पादन नहीं बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है। जब प्रशासनिक विवाद और दबाव श्रमिकों की जिंदगी पर असर डालने लगते हैं तो यह केवल औद्योगिक समस्या नहीं बल्कि सामाजिक संकट बन जाता है।
अमलाई खदान आज उस मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है जहां एक तरफ सिस्टम है और दूसरी तरफ मजदूरों की जिंदगी।
सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी
क्या खदान विवादों का समाधान निकलेगा?
क्या मजदूर परिवारों की पीड़ा को समझा जाएगा?
या फिर उत्पादन और सत्ता संघर्ष के बीच मजदूरों की जिंदगी यूं ही पिसती रहेगी?
यदि हालात नहीं सुधरे तो अमलाई खदान का यह संघर्ष सिर्फ औद्योगिक विवाद नहीं रहेगा, बल्कि हजारों परिवारों के भविष्य का सवाल बन सकता है।





