छत्तीसगढ़

स्टाइल बदला, धंधा वही: एमसीबी में अवैध शराब का ‘नया खेल’, संरक्षण और सांठगांठ पर प्रशासन कटघरे में

मुद्दा बड़ा है पर समाधान सवाल लिए खड़ा है।...

एमसीबी।ज़िले में अवैध शराब का कारोबार खत्म होने के बजाय अब नए चेहरे और नए तरीकों के साथ ज़्यादा चालाकी से पनपता दिखाई दे रहा है। सूत्रों के हवाले से सामने आई जानकारी के अनुसार, कथित शराब माफिया राकेश जायसवाल उर्फ़ ‘झींगा’ ने अपने नेटवर्क की कार्यशैली में बदलाव कर लिया है—लेकिन कारोबार का मूल उद्देश्य अब भी वही अवैध शराब बताया जा रहा है। सवाल यह है कि जब तरीक़े बदल रहे हैं, तो क्या निगरानी भी उतनी ही तेज़ हो रही है?
बताया जा रहा है कि पहले जहां बड़े वाहनों के ज़रिये शराब की खेप लाई जाती थी, अब वही सप्लाई स्कूटी, बाइक और छोटे–छोटे रूट्स से की जा रही है, ताकि कानून की नज़र से बचा जा सके। यह बदलाव इस बात का संकेत माना जा रहा है कि नेटवर्क को कार्रवाई का डर तो है, लेकिन कानून का भय नहीं।
सूत्रों के अनुसार, यह कथित नेटवर्क मनेन्द्रगढ़, लेदरी, झगड़ाखांड, खोँगापानी सहित आसपास के इलाकों तक फैला हुआ बताया जा रहा है। आरोप हैं कि पड़ोसी राज्य मध्यप्रदेश से शराब की अवैध खेप ज़िले में प्रवेश करती है और फिर स्थानीय स्तर पर सक्रिय गुर्गों के माध्यम से आगे बढ़ाई जाती है। भले ही इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि न हो सकी हो, लेकिन लगातार उठते सवाल प्रशासनिक दावों की ज़मीनी हकीकत पर गंभीर संदेह पैदा करते हैं।
स्थानीय जानकारों का कहना है कि अब सप्लाई के लिए रात का समय, सुनसान रास्ते और ढाबों को सुरक्षित ठिकाना बनाया जा रहा है। कई नागरिकों ने शिकायत की है कि कुछ ढाबों पर देर रात खुलेआम शराब सेवन की गतिविधियाँ दिखाई देती हैं, जिससे कानून–व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा पर सीधा खतरा मंडराता है। सवाल यह भी उठता है कि यदि सब कुछ नियंत्रण में है, तो फिर ऐसी गतिविधियाँ खुलेआम कैसे फल–फूल रही हैं?
सबसे गंभीर आरोप कथित संरक्षण और सांठगांठ को लेकर सामने आए हैं। सूत्रों का दावा है कि प्रभावशाली सिफ़ारिशों और “मधुर संबंधों” की आड़ में नेटवर्क को संरक्षण मिलता है। यहां तक कि प्रभाव के बदले महंगी शराब की आपूर्ति जैसे प्रलोभनों की भी चर्चा है। हालांकि, किसी अधिकारी या कर्मचारी का नाम लिए बिना यह स्पष्ट किया जा रहा है कि इन आरोपों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, और पुलिस प्रशासन पूर्व में ऐसे आरोपों को खारिज करता रहा है।
स्थानीय लोगों का आरोप है कि अवैध शराब के खिलाफ होने वाली कार्रवाइयाँ अक्सर खानापूर्ति तक सिमट जाती हैं। छोटे–मोटे लोगों को पकड़कर तस्वीरें खिंचवा ली जाती हैं, जबकि कथित बड़े चेहरे हमेशा कानून की पकड़ से बाहर रहते हैं। यही कारण है कि नेटवर्क टूटने के बजाय हर बार नया रूप धारण कर लेता है।
सूत्रों का कहना है कि सरगना नहीं, केवल मोहरे पकड़े जाते हैं। नेटवर्क की संरचना ऐसी बनाई जाती है कि असली कड़ी तक पहुँचना लगभग असंभव हो जाए। पहले बड़ी खेप, अब छोटे–छोटे हिस्सों में सप्लाई—यह रणनीति इस बात का प्रमाण मानी जा रही है कि जोखिम नीचे के स्तर पर डाल दिया जाता है और ऊपर बैठे लोग सुरक्षित रहते हैं।
पत्रकारिता की जिम्मेदारी के तहत यह भी रेखांकित करना ज़रूरी है कि आरोप और तथ्य के बीच स्पष्ट अंतर रखा जाए। पुलिस प्रशासन का दावा रहा है कि अवैध शराब के विरुद्ध अभियान लगातार चल रहे हैं, सीमावर्ती इलाकों में निगरानी बढ़ाई गई है और शिकायत मिलने पर निष्पक्ष जांच होती है। लेकिन सवाल यह है कि जब शिकायतें बार–बार सामने आ रही हैं, तो नतीजे स्थायी क्यों नहीं दिखते?
नागरिकों की स्पष्ट मांग है—
यदि आरोप निराधार हैं, तो ठोस कार्रवाई और पारदर्शी तथ्य सामने लाए जाएँ;
और यदि कहीं चूक या संरक्षण है, तो बिना भेदभाव जिम्मेदारी तय की जाए।
अवैध शराब केवल राजस्व का नुकसान नहीं, बल्कि सामाजिक स्वास्थ्य, युवा पीढ़ी और कानून–व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा है। अंततः यह मामला किसी एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की परीक्षा है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस चेतावनी को एक और शिकायत मानकर टाल देता है, या फिर वाकई निर्णायक कार्रवाई कर यह साबित करता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं—न मोहरा, न कथित सरगना।

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