अमरकंटक की पुण्यभूमि पर जागी आदिवासी चेतना
जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए उठा स्वाभिमान का शंखनाद
अमरकंटक (अनूपपुर)।मोहम्मद असलम (बाबा)माँ नर्मदा की जन्मस्थली, साधना और साध्य की पवित्र भूमि अमरकंटक, आज केवल आस्था का केंद्र नहीं रही, बल्कि वह आदिवासी स्वाभिमान, अधिकार और अस्तित्व की निर्णायक लड़ाई की साक्षी बनी। सदियों से प्रकृति के साथ सहजीवन जीने वाले आदिवासी समाज की पीड़ा, आक्रोश और संकल्प आज शब्द बनकर, स्वर बनकर और हुंकार बनकर इस पुण्यभूमि से गूंज उठे।
विस्थापन की नीतियों और तथाकथित विकास के नाम पर हो रहे अन्याय के विरोध में आयोजित भव्य आदिवासी सम्मेलन में हजारों की संख्या में आदिवासी समाजजन, किसान, मजदूर और युवा एकत्र हुए। यह केवल एक सभा नहीं थी, बल्कि यह अपनी जड़ों को बचाने का सामूहिक संकल्प था।
नेतृत्व के स्वर में आदिवासी आत्मा की गूंज
सम्मेलन के मुख्य अतिथि, पूर्व नगरीय प्रशासन मंत्री एवं राघौगढ़ विधायक जयवर्धन सिंह ने जब मंच से बोलना शुरू किया, तो उनके शब्दों में अमरकंटक की पवित्रता और आदिवासियों के प्रति गहरी संवेदना स्पष्ट झलक रही थी। उन्होंने कहा कि अमरकंटक केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि भारत की आत्मा है, और यहां के आदिवासी उस आत्मा के सच्चे संरक्षक हैं। उनके अस्तित्व से किसी भी प्रकार का समझौता राष्ट्र की चेतना से समझौता होगा।
जल, जंगल और जमीन पर अधिकार का उद्घोष
आदिवासी समाज की मुखर आवाज, झाबुआ विधायक विक्रांत भूरिया ने युवाओं में जोश भरते हुए कहा कि आदिवासी समाज ने कभी किसी से कुछ छीना नहीं, बल्कि प्रकृति को संजोया है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा कि जल, जंगल और जमीन पर आदिवासियों का अधिकार किसी दया का विषय नहीं, बल्कि उनका जन्मसिद्ध अधिकार है, जिसे छीनने की हर कोशिश का पुरजोर विरोध किया जाएगा।
डिंडोरी विधायक एवं पूर्व कैबिनेट मंत्री ओमकार सिंह मरकाम ने सरकार की नीतियों पर करारा प्रहार करते हुए कहा कि विकास यदि आदिवासियों को उजाड़कर किया जाए, तो वह विकास नहीं, बल्कि विनाश है। उन्होंने चेतावनी दी कि आदिवासी समाज अब चुप नहीं बैठेगा और अन्याय के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष करेगा।
स्थानीय पीड़ा, साझा संघर्ष
पुष्पराजगढ़ विधायक फुंदेलाल सिंह मार्को ने क्षेत्र की जमीनी सच्चाइयों को मंच पर रखते हुए कहा कि आदिवासी अंचलों में आज भी भेदभाव और उपेक्षा की गहरी छाया है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को केवल योजनाओं का लाभार्थी नहीं, बल्कि नीति निर्माण का सहभागी बनाया जाना चाहिए।
इस आयोजन की मजबूत नींव रखने में अनूपपुर के किसान नेता रमेश सिंह की भूमिका उल्लेखनीय रही। उन्होंने किसानों और मजदूरों की आवाज को आदिवासी संघर्ष से जोड़ते हुए कहा कि यह लड़ाई केवल जमीन की नहीं, बल्कि सम्मान और भविष्य की है।
संगठन, समरसता और युवाओं की ऊर्जा
मध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व सचिव इबरार खान ने अपने वक्तव्य में सर्वधर्म समभाव और सामाजिक एकता पर बल देते हुए कहा कि आदिवासी समाज की रक्षा केवल एक समुदाय का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की कसौटी है।
धनपुरी क्षेत्र से पहुंचे कार्यकर्ताओं और युवाओं ने सम्मेलन को नई ऊर्जा दी। धनपुरी ब्लॉक कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष अंकित सिंह के नेतृत्व में आए युवाओं के नारों ने यह संदेश स्पष्ट कर दिया कि आने वाली पीढ़ी अपने अधिकारों के लिए सजग और संघर्षरत है।
आंदोलन की स्पष्ट चेतावनी
सम्मेलन में सभी नेताओं ने एक स्वर में वर्तमान सरकार के बजट को आदिवासी विरोधी बताते हुए उसकी कड़ी आलोचना की। यह भी स्पष्ट किया गया कि यदि विस्थापन की नीतियों पर पुनर्विचार नहीं हुआ, तो यह आंदोलन ब्लॉक से लेकर प्रदेश स्तर तक और अधिक व्यापक एवं उग्र रूप लेगा।
अमरकंटक से निकला संदेश
यह आयोजन केवल एक राजनीतिक मंच नहीं था, बल्कि यह आदिवासी समाज की आत्मा की पुकार था। अमरकंटक की धरती से उठी यह आवाज प्रशासन और सत्ता के गलियारों तक स्पष्ट संदेश पहुंचा गई है कि आदिवासी अब अपने अधिकारों, अपनी भूमि और अपनी पहचान की रक्षा के लिए पूरी तरह जाग चुके हैं, और यह संघर्ष अब रुकने वाला नहीं है।




