अपने कर्मों को सदकर्मों में बदलने की प्रेरणा और ऊर्जा देती है गीता 68वें अ.भा. गीता जयंती महोत्सव में जगदगुरू स्वामी रामदयाल महाराज के आशीर्वचन-सनातन धर्म की मजबूती के लिए शपथ

इंदौर। सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति को मजबूत बनाने की जरूरत है। गीता जयंती महोत्सव जैसे आयोजन हमारी नई पीढ़ी को चेतना और ऊर्जा प्रदान करते हैं। ज्ञान, कर्म और भक्ति का जो अदभुत समन्वय भगवान की अमृतवाणी से प्रकट हुआ है वह सचमुच हम सबके लिए कल्याणकारी है, अर्जुन तो केवल निमित्त था। हम सबके जीवन से सभी तरह के मोह नष्ट हों और हम अपने जीवन में श्रद्धा के साथ अपने कर्तव्यों का पालन करते रहे, यही हम सबका परम लक्ष्य होना चाहिए।
अंतर्राष्ट्रीय रामस्नेही संप्रदाय के आचार्य जगदगुरू स्वामी रामदयाल महाराज ने गुरुवार को गीता भवन में गत 28 नवंबर से चल रहे 68वें अ.भा. गीता जयंती महोत्सव के विश्राम समारोह में अध्यक्षीय उदबोधन देते हुए उक्त प्रेरक बातें कहीं। इसके पूर्व जगद्गुरु स्वामी रामदयाल महाराज के सानिध्य में आचार्य पंडित कल्याण दत्त शास्त्री के निर्देशन में चल रहे 7 दिवसीय विष्णु महायज्ञ की पूर्णाहुति भी यज्ञनारायण के जयघोष के बीच सम्पन्न हुई। धर्मसभा में भदौही से आए पं. पीयूष महाराज, हरिद्वार से आए स्वामी सर्वेश चेतन्य, नैमिषारन्य से आए स्वामी पुरुषोत्तमानंद सरस्वती, गोधरा से आई साध्वी परमानंदा सरस्वती, गोंडा से आए पं. प्रहलाद मिश्र रामायणी, वाराणसी से आए स्वामी कृष्णानंद गिरि एवं अयोध्या से आई दीदी माँ मानस मंदाकिनी ने भी अपने प्रवचनों में गीता एवं अन्य धर्म ग्रन्थों की महत्ता और प्रासंगिकता बताई। जगद्गुरु स्वामी रामदयाल महाराज ने उपस्थित 2 हजार से अधिक श्र्द्धालुओं को सनातन धर्म के प्रति अटूट निष्ठा रखने और विधर्मियों के मंसूबों से सजग रहने की शपथ दिलाई।
दोपहर में महोत्सव में आए सभी संतों का सम्मान कर उन्हें बिदाई भी दी गई। गीता भवन ट्रस्ट के अध्यक्ष राम ऐरन एवं मंत्री रामविलास राठी ने सभी संतों एवं विद्वानों तथा गीता जयंती महोत्सव में सहयोग देने वाले सभी दानदाताओं, भक्तों, पुलिस प्रशासन एवं मीडिया के प्रति आभार व्यक्त किया और आगामी 69वें अ.भा. गीता जयंती महोत्सव में पधारने का न्यौता भी दिया। ट्रस्ट मंडल की ओर से मनोहर बाहेती, प्रेमचंद गोयल, महेशचंद्र शास्त्री, दिनेश मित्तल, टीकमचंद गर्ग, पवन सिंघानिया, हरीश माहेश्वरी, संजीव कोहली, राजेश गर्ग केटी आदि ने संतों एवं विद्वानों का स्वागत किया। सत्संग समिति की ओर से विष्णु बिंदल, सुरेश शाहरा, रामकिशोर राठी, श्याम मोमबत्ती, प्रदीप अग्रवाल, अरविन्द नागपाल, चंद्रप्रकाश गुप्ता, त्रिलोकीनाथ कपूर, सुभाष झंवर, अर्चना एरन आदि ने सभी संतों का सम्मान कर उन्हें भावपूर्ण बिदाई दी। मंच का संचालन डाकोर से आए स्वामी देवकीनंदन दास एवं गोंडा से आए पं. प्रह्लाद मिश्र रामायणी ने किया।
दो-दो गीता भवन होने से भ्रम की स्थिति- ट्रस्ट के अध्यक्ष राम ऐरन ने इस अवसर पर राज्य के यशस्वी मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा राज्य के सभी जिलों में गीता भवन बनाने और इंदौर के गोपाल मंदिर में गीता भवन का लोकार्पण करने के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि निश्चित ही गीता के संदेशों को जन-जन तक पहुँचाने के लिए मुख्यमंत्री के प्रयास अभिनन्दनीय हैं लेकिन 7० वर्षों से मनोरमागंज इंदौर में स्थापित गीता भवन और अब सरकारी गीता भवन के नाम में समानता होने से भ्रम की स्थिति बन गई है। गीता भवन के नाम से दो-दो स्थान बन गए हैं जिसके कारण पुराने गीता भवन की पहचान को लेकर संशय बन रहा है। इस स्थिति में मुख्यमंत्री से आग्रह किया गया है कि वे सरकारी गीता भवन के नाम के साथ राजकीय गीता भवन अथवा गीता ज्ञान भवन या कोई अन्य नामकरण करें ताकि नए और पुराने गीता भवन में भ्रम की स्थिति नहीं रहे और मुख्यमंत्री की भावना के अनुरूप गीता के सन्देश जन-जन तक पहुँच सके। उपस्थित संतों ने भी इस मांग का समर्थन किया।
अध्यक्षीय आशीर्वचन में जगद्गुरु स्वामी रामदयाल महाराज ने कहा कि गीता का मनन और मंथन करने वाला सत्य की अभिव्यक्ति से दूर नहीं रह सकती। गीता मनुष्य को निर्भयता प्रदान करती है। अहंकार चाहे सत्ता का हो, शक्ति और सौंदर्य का हो या संपत्ति का – मनुष्य को पतन के मार्ग पर ले जाता है। गीता केवल पुस्तक नहीं, ज्ञानालय है, जिसके लेखक स्वयं प्रभु श्रीकृष्ण हैं। आग को कपास में लपेटकर या छुपाकर नहीं रख सकते उसी तरह पाप कर्म भी छुपाए नहीं छुपते। गीता हमें अपने कर्मों को सदकर्मों में बदलने के लिए प्रेरणा और ऊर्जा प्रदान करती है।



