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खुद तोड़ा अपनी दुकान का ताला, खुद बनाई चोरी की कहानी — पुलिस जांच में हुआ बड़ा खुलासा

राजगढ़ जिले पुलिस अधीक्षक अमित तोलानी (IPS) के निर्देशन में चोरी एवं नकबजनी के विरुद्ध चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत थाना व्यावरा पुलिस ने एक महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त की है।

अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के.एल. बंजारे एवं अनुविभागीय अधिकारी (पुलिस) व्यावरा प्रकाश शर्मा के मार्गदर्शन में थाना व्यावरा (शहर) पुलिस ने सुठालिया रोड स्थित ऑटो पार्ट्स की दुकान में हुई झूठी चोरी की वारदात का पर्दाफाश किया है।

दिनांक 05.11.2025 को थाना व्यावरा क्षेत्रांतर्गत सुठालिया रोड तिराहा, लोधा धर्मशाला स्थित एक ऑटो पार्ट्स की दुकान में चोरी होने की सूचना प्राप्त हुई थी। सूचना पर थाना पुलिस तत्काल मौके पर पहुंची और जांच प्रारंभ की। इस संबंध में अपराध क्रमांक 808/2025 पंजीबद्ध कर विवेचना में लिया गया।

जांच के दौरान प्राप्त सीसीटीवी फुटेज एवं इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के आधार पर फरियादी दुर्गेश पिता हरिसिंह लववंशी (उम्र 34 वर्ष, निवासी कोडियाखेड़ी) से पूछताछ की गई। दौराने पूछताछ आरोपी दुर्गेश ने स्वीकार किया कि उसने स्वयं ही अपनी दुकान का ताला तोड़ा और झूठी चोरी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी।

🕵️‍♂️ झूठी कहानी का सच:

दुर्गेश ने बताया कि —

“05.11.2025 की शाम लगभग 7 बजे दुकान बंद कर गाँव चला गया था। रात करीब 11:28 बजे मुँह पर कपड़ा बाँधकर वापस आया, अपनी दुकान का ताला खोला और हथौड़ी से तोड़कर कुछ दूर फेंक दिया ताकि लगे कि अज्ञात चोरों ने चोरी की है।”

अगले दिन सुबह उसने आसपास के लोगों को दुकान में चोरी की झूठी सूचना दी और थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई।

कठोर पूछताछ में उसने यह भी स्वीकार किया कि उसने एचडीएफसी बैंक से ₹3 लाख का लोन लिया था और किस्तें समय पर न चुकाने तथा अन्य उधार के दबाव के कारण यह साजिश रची।
जांच में पाया गया कि दुकान से कोई सामान चोरी नहीं हुआ था। ताला तोड़ने में प्रयुक्त हथौड़ा भी दुकान से बरामद किया गया।

इस प्रकार आरोपी द्वारा झूठी रिपोर्ट दर्ज कराना सिद्ध हुआ है, जिस पर थाना व्यावरा पुलिस द्वारा आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।

आमजन से अपील:

राजगढ़ पुलिस नागरिकों से अपील करती है कि—
कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग न करें एवं किसी भी प्रकार की झूठी रिपोर्ट दर्ज न कराएं।
झूठी रिपोर्ट दर्ज कराना एक दंडनीय अपराध है और इससे पुलिस बल का बहुमूल्य समय एवं संसाधन व्यर्थ होते हैं, जिससे वास्तविक अपराधों की जांच प्रभावित होती है।

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