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अंबेडकर सेतु के 4.69 करोड़ के मेंटेनेंस टेंडर पर हाईकोर्ट की रोक   अदालत ने पूछा जब ठेकेदार को मुफ्त में सुधार करना था तो नया टेंडर क्यों?

भोपाल। राजधानी भोपाल के डॉ. भीमराव अंबेडकर सेतु के रखरखाव और मरम्मत के नाम पर जारी किए गए 4.69 करोड़ रुपये के टेंडर ने सरकारी निर्माण व्यवस्था की उस तस्वीर को फिर सामने ला दिया है, जिसमें पुल बन जाने के बाद असली परीक्षा उसकी मजबूती की नहीं, बल्कि उसके रखरखाव के नाम पर निकलने वाले टेंडरों की होती दिखाई देती है। मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाते हुए टेंडर प्रक्रिया पर रोक लगा दी है और सरकार से ऐसा सवाल किया है जिसका जवाब केवल एक विभाग को नहीं, बल्कि पूरी सरकारी निर्माण व्यवस्था को देना पड़ेगा। अदालत ने पूछा कि जब निर्माण कंपनी को अनुबंध की शर्तों के तहत सामने आने वाली कमियों को बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के दूर करना था, तो फिर उसी काम के लिए 4.69 करोड़ रुपये का नया टेंडर क्यों जारी किया गया?

 

हाईकोर्ट की यह टिप्पणी इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मामला केवल एक पुल की मरम्मत का नहीं है। मामला सरकारी धन की प्राथमिकता, निर्माण कंपनियों की जवाबदेही और विभागीय निगरानी की कार्यप्रणाली से जुड़ा है। अगर किसी निर्माण कार्य के अनुबंध में यह पहले से तय है कि निर्माण में आने वाली कमियों को संबंधित कंपनी अपने खर्च पर दूर करेगी, तो फिर उसी कमी को दूर करने के लिए सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च करने का रास्ता कैसे खुल गया? यही वह सवाल है जिसने अंबेडकर सेतु के 4.69 करोड़ रुपये के टेंडर को अदालत के कटघरे में खड़ा कर दिया है।

 

सरकारी निर्माण कार्यों में एक कहावत अक्सर सुनने को मिलती है कि सड़क बनती है तो मरम्मत का इंतजार शुरू हो जाता है और पुल बनता है तो मेंटेनेंस का टेंडर तैयार हो जाता है। यह कहावत सच है या नहीं, इसका फैसला तो संबंधित विभाग और उसके अधिकारी ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन अंबेडकर सेतु का मामला कम से कम इतना जरूर पूछ रहा है कि आखिर निर्माण की गुणवत्ता और ठेकेदार की जवाबदेही तय करने के बाद भी जनता के पैसे से दूसरी बार भुगतान की जरूरत क्यों पड़ी?

 

अदालत ने इसी बिंदु पर सरकार की खर्च प्राथमिकताओं पर भी सवाल उठाया है। यह सवाल साधारण नहीं है। सरकारी खजाने में आने वाला हर रुपया किसी न किसी नागरिक की जेब से आता है। कोई किसान टैक्स देता है, कोई कर्मचारी अपनी आय पर कर देता है, कोई व्यापारी जीएसटी देता है और कोई आम नागरिक पेट्रोल-डीजल से लेकर रोजमर्रा की वस्तुओं तक पर अप्रत्यक्ष कर चुकाता है। ऐसे में सरकारी विभाग यदि करोड़ों रुपये किसी काम पर खर्च करने का निर्णय लेते हैं तो जनता को यह जानने का अधिकार है कि खर्च की जरूरत क्यों पड़ी और उस खर्च की जिम्मेदारी किसकी थी।

 

अंबेडकर सेतु के मामले में सवाल बिल्कुल सीधा है। अगर निर्माण कंपनी को कमियां दूर करनी थीं तो उसने उन्हें दूर क्यों नहीं किया? यदि कंपनी ने कमियां दूर नहीं कीं तो विभाग ने अनुबंध की शर्तों के तहत उससे काम क्यों नहीं कराया? और यदि विभाग ने इसके बजाय नया टेंडर निकालना ज्यादा उचित समझा तो 4.69 करोड़ रुपये खर्च करने का आधार क्या था? इन सवालों के जवाब जितने स्पष्ट होंगे, उतना ही यह पता चलेगा कि गलती निर्माण कंपनी की थी, विभागीय निगरानी की थी या फिर पूरी टेंडर प्रक्रिया की।

 

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अदालत ने फिलहाल इस टेंडर प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। इसका मतलब यह नहीं कि पुल की जरूरतें खत्म हो गईं या रखरखाव की आवश्यकता नहीं है। पुल राजधानी के यातायात का महत्वपूर्ण हिस्सा है और उसकी सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। लेकिन सुरक्षा और रखरखाव के नाम पर सरकारी धन खर्च करने से पहले यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि जिस व्यक्ति या कंपनी पर पहले से जिम्मेदारी तय है, उसे उस जिम्मेदारी से मुक्त करके सरकारी खजाने पर अतिरिक्त बोझ न डाला जाए।

 

यह मामला सरकारी अनुबंधों में लिखी शर्तों के महत्व को भी सामने लाता है। टेंडर जारी करते समय शर्तें बनाई जाती हैं, तकनीकी मानक तय किए जाते हैं, निर्माण की गुणवत्ता की निगरानी होती है और भुगतान भी इन्हीं मानकों के आधार पर किया जाता है। इसके बावजूद यदि निर्माण के बाद कमियां सामने आती हैं और उन्हीं कमियों को दूर करने के लिए फिर सरकारी राशि खर्च करनी पड़ती है, तो फिर सवाल यह उठता है कि अनुबंध की शर्तें आखिर किसलिए हैं? क्या वे केवल फाइलों में लिखे जाने के लिए हैं या जरूरत पड़ने पर संबंधित ठेकेदार से काम कराने के लिए भी?

 

अदालत की टिप्पणी ने इस पूरे प्रश्न को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया है। यदि निर्माण कंपनी को दोष दूर करने की जिम्मेदारी थी, तो विभाग को सबसे पहले उसी कंपनी से काम कराने की कोशिश करनी चाहिए थी। अगर कंपनी ऐसा करने से इनकार करती है तो अनुबंध में उपलब्ध कानूनी और वित्तीय प्रावधानों का इस्तेमाल किया जा सकता है। लेकिन सीधे नया टेंडर निकालकर सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये खर्च करने का फैसला क्यों लिया गया, यही बात अब जांच और न्यायिक स्क्रूटिनी के केंद्र में है।

 

यहां एक और बड़ा सवाल सरकारी विभागों की जवाबदेही का है। टेंडर तैयार करने से लेकर उसकी तकनीकी स्वीकृति, वित्तीय स्वीकृति और कार्यादेश जारी होने तक कई स्तरों पर प्रक्रिया चलती है। कोई एक व्यक्ति अचानक बैठकर 4.69 करोड़ रुपये का टेंडर जारी नहीं कर देता। फाइल कई टेबलों से गुजरती है, अधिकारियों की टिप्पणियां दर्ज होती हैं और अंततः निर्णय लिया जाता है। ऐसे में यदि अदालत को प्रथम दृष्टया यह सवाल दिखाई देता है कि जब ठेकेदार को मुफ्त में कमियां दूर करनी थीं तो नया टेंडर क्यों निकाला गया, तो विभाग के भीतर भी यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि इस प्रक्रिया को मंजूरी देने वालों ने अनुबंध की मूल शर्तों को किस नजर से देखा?

 

सरकारी कामकाज में सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब जिम्मेदारी सामूहिक हो जाती है और जवाबदेही किसी की नहीं रहती। फाइल पर कई हस्ताक्षर होते हैं, लेकिन गलती होने पर कोई जिम्मेदार नहीं मिलता। निर्माण के समय गुणवत्ता की जिम्मेदारी किसी की, निरीक्षण की जिम्मेदारी किसी की, भुगतान की जिम्मेदारी किसी की और मरम्मत के समय फिर किसी दूसरे टेंडर की व्यवस्था। आखिर में पैसा जनता का और सवाल भी जनता के।

 

अंबेडकर सेतु के मामले ने इस व्यवस्था के सामने आईना रख दिया है। अदालत का सवाल जितना छोटा है, उसका असर उतना ही बड़ा है जब ठेकेदार को अपनी गलती मुफ्त में सुधारनी थी तो जनता से दोबारा पैसा क्यों लिया जा रहा था?

 

यह सवाल मध्य प्रदेश के दूसरे सरकारी निर्माण कार्यों पर भी लागू हो सकता है। यदि किसी पुल, सड़क, भवन या अन्य अधोसंरचना के निर्माण अनुबंध में दोष सुधारने की जिम्मेदारी ठेकेदार की होती है, तो क्या उन सभी मामलों में विभाग पहले यह देखता है कि ठेकेदार से काम कराया जाए? या फिर कुछ मामलों में नया टेंडर निकालना ज्यादा आसान रास्ता बन जाता है? यदि ऐसा है तो यह सरकारी वित्तीय अनुशासन के लिए गंभीर विषय है।

 

सरकार की ओर से अदालत में इस संबंध में जो जवाब दिया जाएगा, वह महत्वपूर्ण होगा। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि अंबेडकर सेतु की स्थिति क्या थी, किस प्रकार की कमियां सामने आईं, निर्माण कंपनी की अनुबंधीय जिम्मेदारी कितनी थी, वह जिम्मेदारी क्यों लागू नहीं कराई गई और 4.69 करोड़ रुपये के टेंडर की आवश्यकता किस तकनीकी आधार पर निर्धारित हुई। साथ ही यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि नए टेंडर से होने वाला खर्च किन कार्यों पर किया जाना था और क्या वे कार्य वास्तव में मूल निर्माण अनुबंध के दायरे से बाहर थे।

 

क्योंकि अगर सरकार यह साबित कर देती है कि प्रस्तावित मेंटेनेंस मूल अनुबंध में शामिल काम से अलग था और अतिरिक्त कार्य के लिए नया टेंडर जरूरी था, तो स्थिति अलग होगी। लेकिन यदि दस्तावेजों से यह सामने आता है कि जिस काम के लिए नया टेंडर निकाला गया था, वही काम निर्माण कंपनी को बिना अतिरिक्त भुगतान के करना था, तो फिर सवाल सिर्फ 4.69 करोड़ रुपये का नहीं रहेगा। तब सवाल यह होगा कि सरकारी धन बचाने की जिम्मेदारी निभाने वालों ने उसे बचाने की कोशिश क्यों नहीं की।

 

अदालत की सख्ती का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सरकारी धन को खर्च करना कोई औपचारिक प्रक्रिया नहीं हो सकती। हर खर्च के पीछे कारण होना चाहिए और हर कारण के पीछे जवाबदेही। जनता के पैसे से बनने वाले पुल केवल सीमेंट और लोहे से नहीं बनते, वे भरोसे से बनते हैं। जब वही पुल कुछ समय बाद करोड़ों रुपये के नए मेंटेनेंस टेंडर का कारण बनता है, तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि निर्माण के समय गुणवत्ता की जांच कहां थी और अनुबंध में ठेकेदार की जिम्मेदारी आखिर किसलिए तय की गई थी।

 

डॉ. भीमराव अंबेडकर के नाम पर बने इस सेतु के मामले में अब अदालत ने सरकारी व्यवस्था को एक ऐसा आईना दिखाया है, जिसमें सिर्फ पुल दिखाई नहीं देता, बल्कि पूरी व्यवस्था दिखाई देती है। निर्माण की गुणवत्ता से लेकर ठेकेदार की जिम्मेदारी, विभागीय निगरानी से लेकर सरकारी खर्च और टेंडर प्रक्रिया तक सब कुछ सवालों के घेरे में है।

 

फिलहाल हाईकोर्ट की रोक के बाद 4.69 करोड़ रुपये के इस टेंडर पर ब्रेक लग गया है। अब सरकार और संबंधित विभाग के जवाब का इंतजार है। लेकिन जनता के सामने सवाल पहले ही खड़ा हो चुका है सरकारी निर्माण में अगर कमी ठेकेदार की है तो उसका बिल भी ठेकेदार भरेगा या हर बार सरकारी खजाने की चाबी ही घूमेगी?

 

अंबेडकर सेतु की मरम्मत जरूरी हो सकती है, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी है उस व्यवस्था की मरम्मत, जिसमें एक ही कमी को सुधारने के लिए पहले ठेकेदार जिम्मेदार होता है और बाद में वही काम सरकारी खजाने की जिम्मेदारी बन जाता है। हाईकोर्ट ने फिलहाल टेंडर रोक दिया है; अब देखना यह है कि अदालत के सवालों का जवाब व्यवस्था देती है या फिर फाइलों में जवाबदेही की एक और मरम्मत शुरू होती है।

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