मध्यप्रदेश

बौद्धिक संपदा: सृजनात्मक चेतना का कवच है ‘IPR’, नवाचार से ही खुलेगा प्रगति का द्वार

सरदार पटेल विधि महाविद्यालय में राष्ट्रीय सेमिनार का भव्य आयोजन; न्यायविदों और वैज्ञानिकों ने साझा किए विचार

 

जबलपुर | ज्ञान आधारित वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब विचार ही सबसे बड़ी संपत्ति हैं। जब तक हम अपने नवाचारों और मौलिक विचारों को कानूनी सुरक्षा प्रदान नहीं करेंगे, तब तक समाज वास्तविक प्रगति नहीं कर सकता। यह उद्गार जिला न्यायाधीश माननीय हिदायत उल्ला खान ने सरदार पटेल विधि महाविद्यालय में आयोजित “बौद्धिक संपदा अधिकार” (Intellectual Property Rights) विषयक एक दिवसीय संगोष्ठी में मुख्य अतिथि की आसंदी से व्यक्त किए।

गरिमा, ज्ञान और नवाचार के त्रिवेणी संगम के रूप में आयोजित इस सेमिनार में विधि विशेषज्ञों, शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों ने भविष्य की चुनौतियों और अवसरों पर मंथन किया।

सृजनशीलता का सुरक्षा कवच है कानून: श्रीमती रिजवाना कौसर

विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित सीनियर सिविल जज श्रीमती रिजवाना कौसर ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि बौद्धिक संपदा अधिकार दरअसल सृजनशीलता का संरक्षक है। उन्होंने तर्क दिया कि:

“हर मौलिक शोध और विचार अपने भीतर एक नई दुनिया समेटे होता है। IPR उस दुनिया को चोरी होने से बचाने वाला सुरक्षा कवच है।”

उन्होंने भावी अधिवक्ताओं से आह्वान किया कि वे न केवल कानून की बारीकियां सीखें, बल्कि उसे समाजोपयोगी बनाने की दिशा में भी कार्य करें।

शिक्षा और तकनीक का समन्वय

द्वितीय सत्र में विशेषज्ञों ने तकनीकी पहलुओं पर प्रकाश डाला। धर्मशास्त्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (DNLU) के रजिस्ट्रार डॉ. प्रवीण त्रिपाठी ने भारत में IPR के कानूनी ढांचे और व्यावहारिक बाधाओं पर विस्तृत चर्चा की। वहीं, भोपाल से आए मध्य प्रदेश विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के वैज्ञानिक डॉ. निपुण सिलावट ने स्पष्ट किया कि कोई भी वैज्ञानिक नवाचार तब तक अधूरा है, जब तक उसका पेटेंट या संरक्षण सुनिश्चित न हो। डॉ. मनीषा जायसवाल (प्राचार्या, एन.ई.एस. विधि महाविद्यालय) ने शिक्षण संस्थानों में नवाचार की चेतना जागृत करने की आवश्यकता पर बल दिया।

शोध पत्रों के माध्यम से हुआ वैचारिक आदान-प्रदान

सेमिनार के दौरान अकादमिक सत्र में विद्यार्थियों और प्राध्यापकों ने उत्कृष्ट शोध पत्र प्रस्तुत किए। विशेषज्ञों के पैनल ने इन शोध पत्रों की गुणवत्ता को सराहा। समापन सत्र में श्रेष्ठ प्रस्तुति देने वाले प्रतिभागियों को अतिथियों द्वारा प्रशस्ति पत्र एवं स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। महाविद्यालय परिवार की ओर से अतिथियों का स्वागत शाल-श्रीफल एवं प्रतीक चिन्ह भेंट कर किया गया।

आयोजन के सूत्रधार

कार्यक्रम का प्रभावशाली संचालन प्रो. अंजना कुरील ने किया। अंत में महाविद्यालय के संचालक इंजीनियर प्रभात दुबे ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। आयोजन को सफल बनाने में प्रमुख रूप से:

डॉ. प्रियंका दुबे (सेमिनार सचिव/प्राचार्या)

जय श्री मंडल (संयोजक)

लता नादर (विभागाध्यक्ष)

सहित प्रवीण, पल्लवी, गौतम दास, उर्मिला साकेत, आशीष पाठक, इंद्र कुमार द्विवेदी, मोहित यादव और मनीषा चौधरी एवं समस्त स्टाफ की सक्रिय सहभागिता रही।

निष्कर्ष: यह सेमिनार न केवल किताबी ज्ञान तक सीमित रहा, बल्कि इसने विद्यार्थियों को भविष्य की ‘नॉलेज इकोनॉमी’ के लिए तैयार करने का एक सशक्त मंच प्रदान किया। जबलपुर के शैक्षणिक इतिहास में इस आयोजन को बौद्धिक जागरूकता की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर माना जा रहा है।

Related Articles

Back to top button