शहडोल में ‘रेत’ का काला खेल: बॉडी में लोहे की चादर, जनता की जेब पर डाका!
बड़ा खुलासा: 200 घनफीट बोलकर दे रहे सिर्फ 130, माफियाओं ने डंपरों को बनाया 'ठगी का डब्बा'

शहडोल।(असलम बाबा)जिले में रेत माफिया अब सिर्फ नदियों का सीना नहीं छलनी कर रहे, बल्कि आम आदमी के घर बनाने के सपने को भी लूट रहे हैं। रेत के इस काले कारोबार में जालसाजी का ऐसा ‘इंजीनियरिंग मॉडल’ तैयार किया गया है कि बाहर से डंपर फुल दिखता है, लेकिन अंदर लोहे की चादरों का खेल कर मात्रा आधी कर दी जाती है। समाजसेवी अशरफ खान ने कलेक्टर को साक्ष्यों के साथ शिकायत सौंपकर इस संगठित लूट का कच्चा चिट्ठा खोला है।
इंजीनियरिंग ऐसी कि इंजीनियर भी शरमा जाएं!
रेत के अवैध कारोबारियों ने ठगी का नायाब तरीका निकाला है। शिकायत के मुताबिक, जिले में दौड़ रहे 70 प्रतिशत डंपरों की बॉडी में तकनीकी हेराफेरी की गई है।
अदृश्य पट्टियां: डंपर के अंदर लोहे के एंगल और चादरें इस तरह फिट की गई हैं कि गाड़ी की गहराई 8 से 10 इंच कम हो गई है।
दिखावा बनाम हकीकत: ग्राहक को लगता है कि उसने 200 घनफीट रेत खरीदी है, लेकिन जब गाड़ी खाली होती है, तो उसमें महज 130 घनफीट रेत निकलती है।
ऊंची कीमत, कम माल: 5000 रुपये की रेत के बदले जनता से 8000 रुपये वसूले जा रहे हैं। यानी कम माल और ज्यादा दाम—जनता पर दोहरी मार।
हाईवा से ट्रॉली का ‘मुनाफा एक्सप्रेस’ खेल
जांच में एक और चौंकाने वाला तरीका सामने आया है। माफिया पहले हाईवा से रेत एक डंप यार्ड में डंप करते हैं। इसके बाद छोटी ट्रॉलियों के जरिए इसे सप्लाई किया जाता है। खेल देखिए—एक हाईवा की रेत को 5 से 6 ट्रिप बनाकर बेचा जा रहा है। ग्रामीण और सीधे-साधे लोग, जो नाप-तौल की बारीकियों को नहीं समझते, वे इस जालसाजी का सबसे आसान शिकार बन रहे हैं।
प्रशासन की नाक के नीचे ‘खुली डकैती’
समाजसेवी अशरफ खान ने कलेक्टर को सौंपे पत्र में सीधा सवाल उठाया है कि आखिर नाप-तौल विभाग और खनिज विभाग की आंखों में धूल झोंककर ये गाड़ियां सड़कों पर कैसे दौड़ रही हैं? विशेष रूप से 912 मॉडल डंपरों को ‘ठगी का केंद्र’ बताया गया है। शिकायत की प्रतियां खनिज अधिकारी और नाप-तौल विभाग को भी भेजी गई हैं।
“गरीब आदमी जीवन भर की पूंजी लगाकर घर बनाता है। रेत माफिया उस पूंजी पर गिद्ध की तरह झपट्टा मार रहे हैं। डंपरों की बॉडी की जांच अनिवार्य है।” > — अशरफ खान, समाजसेवी
दैनिक प्रदेश का गौरव का तीखा सवाल: कब जागेगा प्रशासन?
जिले में रेत माफियाओं का यह दुस्साहस बताता है कि उन्हें कानून का खौफ नहीं है। जनता अब आक्रोशित है और प्रशासन से केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ‘ऑन द स्पॉट’ कार्रवाई चाहती है।
क्या संदिग्ध डंपरों की बॉडी का फिजिकल वेरिफिकेशन होगा?
क्या नाप-तौल विभाग इन फर्जी पैमानों पर ताला लगाएगा?
क्या लूट की रकम वसूल कर पीड़ितों को राहत दी जाएगी?
निष्कर्ष: अब गेंद कलेक्टर के पाले में है। अगर समय रहते इन ‘ठगी के डब्बों’ पर लगाम नहीं कसी गई, तो जनता का सिस्टम पर से भरोसा उठना तय है। शहर से लेकर गांव तक, हर निर्माण स्थल पर आज खौफ है कि कहीं उनके घर की बुनियाद में माफियाओं की ‘धोखाधड़ी वाली रेत’ तो नहीं मिल रही।


